

दवा कंपनियों द्वारा डॉक्टरों को लुभाने के लिए कथित तौर पर महंगे गिफ्ट, विदेशी यात्राएं और अन्य सुविधाएं देने जैसी अनैतिक मार्केटिंग प्रथाओं पर लगाम लगाने के लिए केंद्र सरकार तीन सदस्यीय विशेषज्ञ समिति गठित करेगी.
समिति यह जांचेगी कि फार्मास्युटिकल कंपनियों के लिए कानूनी रूप से बाध्यकारी नियामक व्यवस्था की जरूरत है या नहीं और यदि जरूरत है तो इसके लिए उपयुक्त वैधानिक ढांचा क्या हो. केंद्र ने यह जानकारी सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हलफनामे में दी है.
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने हलफनामे पर विचार करने के बाद फेडरेशन ऑफ मेडिकल एंड सेल्स रिप्रेजेंटेटिव्स एसोसिएशंस ऑफ इंडिया (FMRAI) की याचिका पर अपना आदेश सुरक्षित रख लिया.
FMRAI ने फार्मास्युटिकल कंपनियों की मार्केटिंग गतिविधियों और मेडिकल पेशेवरों के कथित अनैतिक आचरण को नियंत्रित करने के लिए कानूनी रूप से बाध्यकारी और लागू करने योग्य व्यवस्था की मांग की है.
याचिका में आरोप है कि कुछ फार्मा कंपनियां डॉक्टरों को प्रभावित करने के लिए हाई-प्रेशर मार्केटिंग, महंगे उपहार, विदेशी यात्राएं और अन्य ‘फ्रीबीज’ देती हैं, ताकि वे महंगी ब्रांडेड दवाएं या तर्कहीन ड्रग कॉम्बिनेशन लिखें.
केंद्र ने कहा कि Uniform Code for Pharmaceutical Marketing Practices (UCPMP), 2024 फिलहाल संतोषजनक ढंग से काम कर रहा है. विशेष रूप से मेडिकल प्रैक्टिशनर्स के अनैतिक आचरण को नियंत्रित करने के लिए पहले से वैधानिक व्यवस्था मौजूद है.
हालांकि, सरकार ने माना कि फार्मास्युटिकल कंपनियों के आचरण को सीधे नियंत्रित करने के लिए मौजूदा कानूनों में स्पष्ट वैधानिक व्यवस्था का अभाव है. इसलिए तीन सदस्यीय समिति इस पहलू की जांच करेगी. समिति की रिपोर्ट और उस पर सरकार के निर्णय तक UCPMP, 2024 लागू रहेगा.
केंद्र ने बताया कि 2013 से 2018 के बीच फार्मा मार्केटिंग कोड को वैधानिक आधार देने के कई प्रयास किए गए. 2016-17 में Essential Commodities Act, 1955 के तहत इसे लागू करने का प्रस्ताव भी आया, लेकिन इसके अधिकार क्षेत्र, क्रियान्वयन और कानूनी उपयुक्तता पर सवाल उठे.
इसके बाद Drugs and Cosmetics Act, 1940 के तहत नियमन की संभावना पर विचार किया गया. सरकार के मुताबिक यह कानून मुख्य रूप से दवाओं के निर्माण, गुणवत्ता और बिक्री को नियंत्रित करता है, जबकि Essential Commodities Act दवाओं की आपूर्ति, वितरण और कीमतों से संबंधित है.
इसलिए इन कानूनों के जरिए फार्मा कंपनियों और डॉक्टरों के बीच होने वाले व्यवहार को नियंत्रित करना स्पष्ट कानूनी ढांचे के अनुरूप नहीं पाया गया. सितंबर 2022 में केंद्र ने डॉ. वीके पॉल की अध्यक्षता में उच्चस्तरीय समिति बनाई थी. समिति ने वैश्विक व्यवस्थाओं और कानूनी रूप से लागू किए जाने वाले तंत्र की जरूरत समेत विभिन्न पहलुओं की जांच की थी.
समिति ने उस समय UCPMP को वैधानिक बनाने की जरूरत नहीं मानी थी. इसके बजाय उसने पारदर्शिता बढ़ाने, स्वतंत्र निगरानी, शिकायतों की बेहतर मॉनिटरिंग, IT आधारित डिस्क्लोजर और नेशनल मेडिकल कमीशन के नियमों के साथ बेहतर तालमेल की सिफारिश की थी. इन्हीं सिफारिशों के बाद UCPMP, 2024 लाया गया.
इसमें फार्मा मेडिकल के लिए एथिक्स CEO की स्व घोषणा, खर्चों का खुलासा, तोहफे, डॉक्टरों को दिए जाने वाले सैंपल और मेडिकल एजुकेशन से जुड़े नियमों को मजबूत किया गया है.
अब तक सिर्फ तीन शिकायतें ACPMP के पास
केंद्र ने अपने हलफनामे में UCPMP के तहत प्राप्त शिकायतों का भी ब्यौरा दिया है. Apex Committee for Pharma Marketing Practice (ACPMP) को अब तक तीन शिकायतें मिली हैं
इनमें से एक शिकायत में आरोप था कि एक फार्मास्युटिकल कंपनी ने करीब 30 डॉक्टरों को महंगी यात्राएं उपलब्ध कराईं. कंपनी को UCPMP, 2024 के उल्लंघन के लिए फटकार लगाई गई और डॉक्टरों की सूची उचित कार्रवाई के लिए नेशनल मेडिकल कमीशन को भेजी गई
दो अन्य शिकायतों में से एक पर प्रक्रिया जारी है, जबकि दूसरी शिकायत को आवश्यक जानकारी उपलब्ध नहीं कराने के कारण आगे नहीं बढ़ाया जा सका. उद्योग संगठनों की एथिक्स कमेटी को कुल सात शिकायतें मिलीं इनमें से तीन अपील ACPMP तक पहुंचीं, जबकि चार शिकायतों का निपटारा एसोसिएशन स्तर पर किया गया
डॉक्टरों पर पहले से वैधानिक रोक
केंद्र ने कहा कि डॉक्टरों द्वारा फार्मा कंपनियों से गिफ्ट, यात्रा, हॉस्पिटैलिटी या नकद/मौद्रिक लाभ लेने पर पहले से नेशनल मेडिकल कमीशन एक्ट, 2019 और पेशेवर आचरण संबंधी नियम लागू हैं. इन नियमों के उल्लंघन पर डॉक्टरों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की जा सकती है, जिसमें censure से लेकर मेडिकल रजिस्टर से नाम हटाने तक की कार्रवाई शामिल है.
हालांकि, केंद्र ने स्वीकार किया कि फार्मास्युटिकल कंपनियों द्वारा डॉक्टरों को प्रभावित करने के लिए अपनाई जाने वाली अनैतिक प्रथाओं को सीधे नियंत्रित करने के मामले में नियामक खामी है. इसी खामी की जांच के लिए अब तीन सदस्यीय विशेषज्ञ समिति गठित की जाएगी. समिति यह तय करेगी कि फार्मा कंपनियों के लिए अलग से वैधानिक ढांचा जरूरी है या मौजूदा UCPMP को ही और मजबूत किया जाए.





