

राज कपूर की फिल्म मेरा नाम जोकर जब 1970 में रिलीज हुई तो इसे उनके करियर का सबसे महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट माना गया. करीब छह साल में बनी यह फिल्म उम्मीदों पर खरी नहीं उतर सकी और बॉक्स ऑफिस पर बुरी तरह फ्लॉप हो गई. इस नाकामी ने राज कपूर को गहरे आर्थिक संकट में डाल दिया. उन्हें भारी कर्ज का सामना करना पड़ा और आर.के. स्टूडियो तक गिरवी रखने की नौबत आ गई. लेकिन इसी दर्द और संघर्ष से एक ऐसा गीत जन्मा, जिसने वक्त को मात दे दी. ‘जीना यहां, मरना यहां’ आज भी जिंदगी का सबसे खूबसूरत फलसफा सुनाता है और रिलीज के 54 साल बाद भी लोगों के दिलों में उसी शिद्दत से बसता है.
फ्लॉप फिल्म ने तोड़ दिया था राज कपूर का सपना
मेरा नाम जोकर राज कपूर का ड्रीम प्रोजेक्ट था. फिल्म की कहानी, निर्देशन और निर्माण की जिम्मेदारी उन्होंने खुद संभाली थी. करीब 3 घंटे 44 मिनट की यह फिल्म उस दौर के हिसाब से बेहद महत्वाकांक्षी थी. इसमें राज कपूर के साथ सिमी गरेवाल, पद्मिनी, केसेनिया रयाबिन्किना, मनोज कुमार, धर्मेंद्र और उनके बेटे ऋषि कपूर भी नजर आए, जिन्होंने बाल कलाकार के रूप में डेब्यू किया. हालांकि रिलीज के बाद इसकी लंबाई और अलग विषय के कारण दर्शकों ने इसे स्वीकार नहीं किया. फिल्म की असफलता ने राज कपूर को आर्थिक संकट में धकेल दिया और वे भारी कर्ज में डूब गए. बाद के वर्षों में यही फिल्म कल्ट क्लासिक मानी जाने लगी.
दर्द से निकला ‘जीना यहां, मरना यहां’
फिल्म का सबसे यादगार गीत ‘जीना यहां, मरना यहां, इसके सिवा जाना कहां’ आज भी भारतीय सिनेमा के सबसे दार्शनिक गीतों में गिना जाता है. इसके बोल शैलेंद्र ने लिखे थे, जबकि संगीत शंकर-जयकिशन ने दिया और इसे मुकेश ने अपनी भावपूर्ण आवाज से अमर बना दिया. माना जाता है कि राज कपूर ने शैलेंद्र को सिर्फ गीत का मूल भाव बताया था और शैलेंद्र ने अपने निजी संघर्षों और जीवन के अनुभवों को शब्दों में ढाल दिया. यही वजह है कि इस गीत में दर्द, उम्मीद और जीवन का गहरा दर्शन एक साथ महसूस होता है.
वक्त बदला, फिल्म भी बनी मास्टरपीस
रिलीज के समय जिस मेरा नाम जोकर को दर्शकों ने नकार दिया था, वही फिल्म समय के साथ भारतीय सिनेमा की सबसे चर्चित क्लासिक फिल्मों में शामिल हो गई. समीक्षक और फिल्म प्रेमी इसे राज कपूर की सबसे निजी और परिपक्व कृतियों में गिनते हैं. फिल्म का संदेश भी आज उतना ही प्रासंगिक लगता है- जिंदगी में दुख और असफलताएं आएंगी, लेकिन मुस्कुराते हुए आगे बढ़ना ही असली जीत है. शायद यही वजह है कि ‘जीना यहां, मरना यहां’ सिर्फ एक फिल्मी गीत नहीं, बल्कि जिंदगी जीने का नजरिया बन चुका है.
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