
धार:
कड़ी मेहनत, सही मार्गदर्शन और आत्मविश्वास से कोई भी व्यक्ति अपनी आर्थिक स्थिति बदल सकता है. मध्यप्रदेश के धार जिले के ग्राम शिकारपुरा की रहने वाली दुर्गाबाई इसकी एक प्रेरणादायक मिसाल हैं. लगभग दस वर्ष पहले उन्होंने कृषि विज्ञान केंद्र के सहयोग से कड़कनाथ मुर्गी पालन शुरू किया था. शुरुआत छोटे स्तर से हुई, लेकिन लगातार प्रयासों और बेहतर प्रबंधन ने इसे एक सफल व्यवसाय में बदल दिया. आज दुर्गाबाई न केवल अपने परिवार की आर्थिक जरूरतें पूरी कर रही हैं, बल्कि ग्रामीण महिलाओं के लिए आत्मनिर्भरता का उदाहरण भी बन चुकी हैं.
कड़कनाथ पालन बना अतिरिक्त आय का जरिया
जीआई टैग प्राप्त कड़कनाथ मुर्गे की पहचान उसके अनोखे काले रंग और मांस के कारण देश-दुनिया में है. झाबुआ क्षेत्र से प्रसिद्ध हुई यह नस्ल अब धार जिले में भी किसानों के लिए आय बढ़ाने का माध्यम बन रही है. धार जिले के नालछा ब्लॉक के ग्राम शिकारपुरा की दुर्गाबाई ने करीब एक दशक पहले कड़कनाथ मुर्गी पालन का कार्य शुरू किया. उस समय यह प्रयोग सीमित स्तर पर था, लेकिन धीरे-धीरे यह उनके परिवार की आर्थिक मजबूती का आधार बन गया.

कड़कनाथ के चूजे अंड़ों से निकलते हुए
Photo Credit: NDTV
कृषि विज्ञान केंद्र से मिला प्रशिक्षण
NDTV से बात करते हुए दुर्गाबाई ने बताया कि उन्हें कृषि विज्ञान केंद्र धार से कड़कनाथ पालन का प्रशिक्षण मिला. केंद्र द्वारा उपलब्ध कराए गए चूजों और तकनीकी मार्गदर्शन की मदद से उन्होंने इस व्यवसाय की शुरुआत की. कृषि विज्ञान केंद्र द्वारा किसानों को कड़कनाथ पालन की आधुनिक जानकारी, चूजों की उपलब्धता, दाना प्रबंधन और रोग नियंत्रण की जानकारी दी जाती है. इसी का लाभ उठाकर दुर्गाबाई ने अपने काम को आगे बढ़ाया.
वे आगे कहती है कि चूजे हम 90 रूपए में बेचते हैं और बड़ा मुर्गा अलग-अलग दाम में जाता है. अगर बीमारी आती है तो KVK से सलाह लेते हैं. मैं चाहती हूँ आसपास की महिलाएं भी ये रोजगार अपनाएं, कम समय में ज्यादा फायदा है.

दुर्गाबाई के फार्म में कड़कनाथ प्रजाति के मुर्गे
Photo Credit: NDTV
छह महीने में तैयार होते हैं कड़कनाथ मुर्गे
दुर्गाबाई के अनुसार, चूजों को लगभग छह महीने तक पालने के बाद उन्हें बाजार में बेचा जाता है. एक कड़कनाथ मुर्गा करीब 1,500 से 2,000 रुपये तक में बिक जाता है. समय के साथ उन्होंने मुर्गियों की संख्या बढ़ाई और व्यवसाय का विस्तार किया. इससे उनकी आमदनी भी लगातार बढ़ती गई. ग्रामीण क्षेत्र में रहते हुए उन्होंने साबित किया कि पशुपालन और कुक्कुट पालन जैसे कार्य भी बेहतर आय का साधन बन सकते हैं.

कड़कनाथ मुर्गे के चूजे
Photo: NDTV
कमाई से खरीदा ट्रैक्टर, बच्चों को दिला रहीं शिक्षा
दुर्गाबाई बताती हैं कि कड़कनाथ पालन से हुई आय ने उनके परिवार की आर्थिक स्थिति में बड़ा बदलाव किया. इस कमाई से उन्होंने ट्रैक्टर खरीदा, जिससे खेती के कार्यों में भी सुविधा मिलने लगी. वह अपने बच्चों की पढ़ाई पर भी खर्च कर रही हैं और उन्हें बेहतर शिक्षा दिलाने का प्रयास कर रही हैं. उनका कहना है कि यदि सही प्रशिक्षण और मेहनत हो तो ग्रामीण क्षेत्रों में भी स्वरोजगार के कई अवसर मौजूद हैं.
कई मंचों पर हो चुकी हैं सम्मानित
कड़कनाथ पालन के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य के लिए दुर्गाबाई को विभिन्न मंचों पर सम्मानित भी किया जा चुका है. भोपाल, ग्वालियर सहित कई कार्यक्रमों में उन्हें सम्मान मिला है. उनकी सफलता की कहानी अब दूसरे किसानों और ग्रामीण महिलाओं को भी प्रेरित कर रही है कि वे पारंपरिक खेती के साथ वैकल्पिक आजीविका के साधनों को भी अपनाएं.
किसानों में बढ़ रहा कड़कनाथ पालन का रुझान
कृषि विज्ञान केंद्र धार के वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं प्रमुख डॉ. एस.एस. चौहान ने NDTV पर कहा कि जिले में किसानों का रुझान लगातार कड़कनाथ पालन की ओर बढ़ रहा है. केंद्र की विभिन्न योजनाओं के माध्यम से किसानों को बकरी पालन, मुर्गी पालन और अन्य गतिविधियों का प्रशिक्षण देकर स्वरोजगार के लिए प्रेरित किया जा रहा है.
डॉ. चौहान का कहना है कि किसानों का काफी रुझान कड़कनाथ पर आ रहा है. हमारे यहाँ ARYA योजना जो अब SARAL के नाम से चल रही है, इसमें हम किसानों को बकरी पालन, मुर्गी पालन, नर्सरी जैसी ट्रेनिंग देते हैं. कृषि विज्ञान केंद्र धार के द्वारा किसानों को कड़कनाथ चूजे और दाना फ्री में वितरित किए जा रहे हैं, ताकि वो खेती के साथ-साथ IFS मॉडल अपनाकर आय बढ़ा सकें. कड़कनाथ पालन ग्रामीण परिवारों के लिए अतिरिक्त आय का बेहतर माध्यम बन सकता है. उचित प्रशिक्षण और वैज्ञानिक तरीके अपनाकर किसान इससे अच्छी आमदनी प्राप्त कर सकते हैं.
ग्रामीण महिलाओं के लिए बनी प्रेरणा
डॉ. चौहान बताते हैं कि दुर्गाबाई शिकारपुरा में रहती हैं. महिला होने के बावजूद FPO से जुड़ी हैं और मुर्गी पालन, बकरी पालन कर रही हैं. इन्हें जवाहरलाल नेहरू कृषि विश्वविद्यालय से पिछले साल अवार्ड मिला, राजमाता कृषि विश्वविद्यालय से अगस्त में अवार्ड मिला और हाल ही में भोपाल में दिल्ली प्रेस द्वारा फार्म एंड फूड अवार्ड भी मिला है. वो आसपास के किसानों को भी प्रेरित कर रही हैं.
आज उनकी कहानी ग्रामीण महिलाओं और किसानों के लिए प्रेरणा का स्रोत बन गई है, जो रोजगार और आय बढ़ाने के नए अवसर तलाश रहे हैं.
यह भी पढ़ें : मटर, सिंघाड़े, केले और इमली ही नहीं; कड़कनाथ मुर्गे समेत MP के इन उत्पादों के नाम है GI टैग, देखिए पूरी लिस्ट





