

किर्गिस्तान की राजधानी बिश्केक में आयोजित 26वें शंघाई सहयोग संगठन (SCO) शिखर सम्मेलन ने वाशिंगटन से लेकर इस्लामाबाद तक खलबली मचा दी है. एक तरफ जहां अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप टैरिफ वॉर और एकतरफा फैसलों के जरिए दुनिया पर आर्थिक और रणनीतिक दबाव बनाने की कोशिश कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ बिश्केक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की एक साथ मौजूदगी ने वैश्विक राजनीति का पूरा संतुलन बदल कर रख दिया है. यूरेशिया के मंच पर तीन बड़ी महाशक्तियों के इस तालमेल से वाशिंगटन में बेचैनी साफ तौर पर देखी जा सकती है.
SCO की 25वीं वर्षगांठ के मौके पर आयोजित यह बैठक सिर्फ एक औपचारिक सम्मेलन भर नहीं है, बल्कि यह बहुध्रुवीय वैश्विक व्यवस्था की दिशा में एक बहुत बड़ा पैगाम है. यह संगठन आज दुनिया की करीब 3.4 अरब आबादी और वैश्विक जीडीपी के एक-चौथाई हिस्से का प्रतिनिधित्व करता है.
यूरेशिया बन रहा है शक्ति का नया केंद्र
यूरेशियन परिवहन कॉरिडोर, ऊर्जा सुरक्षा, आतंकवाद और डिजिटल ट्रांसफॉर्मेशन जैसे अहम मुद्दों पर भारत, रूस, चीन, पाकिस्तान और ईरान समेत 10 सदस्य देशों के बीच सहमति बन रही है. पश्चिमी प्रतिबंधों और अमेरिकी टैरिफ दबाव के बावजूद, यूरेशिया में एक नया और मजबूत आर्थिक शक्ति केंद्र उभर रहा है, जिसे अब दुनिया की कोई भी ताकत नजरअंदाज नहीं कर सकती.
बिश्केक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के बीच हुई द्विपक्षीय बातचीत पर भी पूरी दुनिया की नजरें टिकी हुई थीं. इस दौरान पीएम मोदी ने रूस-यूक्रेन युद्ध पर भारत का स्पष्ट रुख दोहराते हुए कहा कि यह जंग पूरी दुनिया और मानवता के लिए बड़ा खतरा है.
उन्होंने जोर देकर कहा कि भारत हमेशा शांति का समर्थक रहा है और संवाद तथा कूटनीति के जरिए ही इस संकट का हल निकाला जा सकता है. वहीं, राष्ट्रपति पुतिन ने भारत के साथ रणनीतिक संबंधों की गहराई को दोहराते हुए रक्षा और ऊर्जा क्षेत्रों में आपसी सहयोग को और मजबूत करने की प्रतिबद्धता जताई. इसके साथ ही पुतिन ने नई दिल्ली में आयोजित होने वाले आगामी BRICS शिखर सम्मेलन में शामिल होने की भी पुष्टि की.
दिल्ली आएंगे शी जिनपिंग?
इस सम्मेलन के इतर प्रधानमंत्री मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच मुलाकात की संभावनाओं ने भी अंतरराष्ट्रीय मीडिया का ध्यान खींचा है. दोनों ही देशों के राष्ट्राध्यक्षों का एक मंच पर होना काफी अहम माना जा रहा है. हालांकि इस दौरान दोनों नेताओं की आपसी मुलाकात के बारे में कुछ स्पष्ट नहीं है.
लेकिन एक्सपर्ट का मानना है कि भारत में हो रहे ब्रिक्स के अगले सम्मेलन से पहले दोनों नेताओं के बीच अलग से मुलाक़ात की प्रबल संभावना है.
2020 के गलवान संघर्ष के बाद दोनों देशों के रिश्तों में आई कड़वाहट के बीच यह घटनाक्रम बेहद संवेदनशील और महत्वपूर्ण माना जा रहा है.
खबर है कि शी जिनपिंग 12-13 सितंबर को नई दिल्ली में होने वाले BRICS सम्मेलन के लिए 7 साल बाद भारत दौरे पर आ सकते हैं. यह दौरा ऐसे वक्त में हो सकता है जब वित्त वर्ष 2025-26 में भारत-चीन द्विपक्षीय व्यापार 151.10 अरब डॉलर के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया है, हालांकि इसमें भारत का व्यापार घाटा 112.16 अरब डॉलर रहा है. इसके अलावा, मई 2026 में निवेश नियमों में दी गई ढील के बाद चीनी निवेश में भी तेजी देखने को मिली है. ऐसे में दोनों नेताओं के बीच सीमा विवाद सुलझाने और व्यापार असंतुलन को कम करने पर बातचीत की उम्मीद है.
भारत की विदेश नीति का बेहतरीन प्रदर्शन
इस पूरे घटनाक्रम के बीच भारत अपनी स्वतंत्र और संतुलित विदेश नीति यानी स्ट्रैटेजिक ऑटोनॉमी का बेहतरीन प्रदर्शन कर रहा है. जहां रूस और चीन इस मंच का इस्तेमाल अक्सर पश्चिमी प्रभाव का मुकाबला करने के लिए करते हैं, वहीं भारत संतुलन बनाए रखने में माहिर रहा है.
भारत एक तरफ क्वाड के जरिए अमेरिका और इंडो-पैसिफिक देशों के साथ जुड़ा है, तो दूसरी तरफ SCO के जरिए रूस और मध्य एशियाई देशों के साथ अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा कर रहा है. पाकिस्तान की मौजूदगी के बावजूद पीएम मोदी ने मंच से आतंकवाद और उग्रवाद के खिलाफ कड़ा संदेश दिया. बिश्केक से उठी यह गूंज साफ संकेत देती है कि अब दुनिया के फैसलों की धुरी सिर्फ वाशिंगटन तक सीमित नहीं है, बल्कि यूरेशिया का यह नया तालमेल एक नई वैश्विक व्यवस्था की पटकथा लिख रहा है.
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