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मैरिटल रेप को अपराध घोषित करने में कौन सा पेंच? भारत में इसे कानून बनाने पर बहस क्यों | Why India Is Still Debating Marital Rape Law



देश में मैरिटल रेप बड़ा मुद्दा है. स्मृति ईरानी के टीवी शो ‘क्योंकि सास भी कभी बहू थी’ के हालिया एपिसोड्स की एक क्लिप तेजी से वायरल हो रही है. शो में तुलसी विरानी का किरदार निभा रहीं स्मृति ईरानी पत्नी के साथ ज़बरदस्ती करने पर अपने पोते पार्थ को जान से मारने की धमकी देती दिख रही हैं, इस सीन ने उस पल की याद फिर से ताजा कर दी जब तुलसी ने पत्नी के साथ रेप को लेकर अपने बेटे अंश को गोली मार दी थी. 

टीवी शो की इस कहानी ने एक बार फिर से भारतीय कानून को लेकर बहस छेड़ दी है. वो है पत्नी की सहमति को पति का जरूरी न समझना. ये सोच आज भी लोगों के जहन में है. मैरिटल रेप देश में अब भी अपराध नहीं है. रियल लाइफ टीवी की दुनिया से अलग है. मैरिटल रेप को अपराध घोषित करने की मांग वाली याचिका कई सालों से सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के इंतजार में है. केंद्र सरकार ने इन याचिकाओं के खिलाफ अपना आधिकारिक रुख अपनाया है.

मैरिटल रेप पर बहस में कई पेंच 

फिलहाल, भारतीय कानून में मैरिटल रेप को अपराध नहीं माना जाता. भारतीय न्याय संहिता (BNS) में भी शादीशुदा लोगों के मामले में रेप के खिलाफ कानून में एक अपवाद है. ब्रिटिश काल के इंडियन पीनल कोड, 1860 (IPC) की धारा 375 की तरह ही, BNS की नई धारा 63 के मुताबिक, अगर कोई पुरुष अपनी पत्नी के साथ यौन संबंध बनाता है और पत्नी की उम्र 18 साल से कम नहीं है, तो इसे रेप नहीं माना जाएगा.

मैरिटल रेप 130 से ज्यादा देशों में अपराध

130 से ज्यादा देशों ने मैरिटल रेप को अपराध घोषित करते हुए ये माना कि शादी को यौन हिंसा के बचाव के तौर पर इस्तेमाल नहीं किया जा सकता. हालांकि, भारत में मैरिटल रेप पर  बहस इतनी सीधी नहीं है. जमीनी स्तर पर ऐसे मामलों को देखने वाली सुप्रीम कोर्ट की वकील आकांक्षा राय ने NDTV से कहा कि मैरिटल रेप पर बहस अक्सर शादी की पवित्रता की धारणा तक ही सीमित रह जाती है. असली मुद्दा ये है कि क्या शादी किसी को ऐसे काम के लिए छूट देती है जो किसी और व्यक्ति द्वारा किए जाने पर रेप माना जाता? उन्होंने कहा कि एक संवैधानिक लोकतंत्र में इसका जवाब साफ तौर पर ‘नहीं’ होना चाहिए.

कर्नाटक HC के फैसले पर सुप्रीम कोर्ट ने लगाई रोक

आकांक्षा राय ने NDTV को बताया, “कर्नाटक हाई कोर्ट के जस्टिस एम नागप्रसन्ना ने एक पति के खिलाफ रेप की कार्यवाही को रद्द करने से इनकार करते हुए एक अहम बात कही थी कि पुरुष पुरुष होता है, काम काम होता है, और रेप रेप होता है, चाहे वह पति ने किया हो या किसी अजनबी ने.” हालांकि, हाई कोर्ट के इस फैसले पर बाद में सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगा दी. मामला अभी भी वहां लंबित है.

ऐसे मामलों पर काम करने वाली सीनियर वकील और एक्टिविस्ट आभा सिंह की राय मैरिटल रेप के मुद्दे पर अलग है. उन्होंने  NDTV से बातचीत में कहा कि महिलाओं के खिलाफ पति द्वारा की जाने वाली हिंसा से निपटने के लिए हमारे मौजूदा कानून – जैसे ‘घरेलू हिंसा रोकथाम कानून’ और BNS के अन्य आपराधिक कानून – काफी हैं. एक वकील के तौर पर उन्होंने अदालतों में कानूनों का गलत इस्तेमाल होते देखा है. इसीलिए वह मैरिटल रेप को अपराध की श्रेणी में लाने का सुझाव नहीं देंगी.

उन्होंने कहा कि जब ऐसा मामला ट्रायल कोर्ट में जाएगा, तो यह साबित करना बहुत मुश्किल होगा कि शादीशुदा जोड़े के बीच बंद दरवाज़ों के पीछे क्या हुआ था. उन्होंने आगे कहा कि अभी देश में POCSO कानून और शादी का झूठा झांसा देकर रेप करने से जुड़े कानूनों का सबसे ज़्यादा गलत इस्तेमाल हो रहा है.

अभी ऐसे मामलों से कैसे निपटा जाता है?

मौजूदा कानून के मुताबिक, अगर कोई पत्नी दुर्व्यवहार या हिंसा की ऐसी घटना की शिकायत करना चाहती है, तो वह ‘घरेलू हिंसा कानून’ और अन्य आपराधिक कानूनों के तहत कर सकती है, जो कि मारपीट, हत्या जैसे अपराधों से संबंधित हैं. वकील आकांक्षा राय ने बताया कि हिंसा के खिलाफ़ सामान्य दंडात्मक प्रावधानों के अलावा, भारतीय कानून खुद यह मानता है कि शादी के अंदर बिना सहमति के यौन संबंध बनाना कुछ खास हालात में अपराध हो सकता है. भारतीय न्याय संहिता की धारा 67 पत्नी के अलग रहने के दौरान पति का उसकी सहमति के बिना यौन संबंध बनाने को अपराध मानती है. अगर कानून यह मानता है कि अलग रहने के दौरान सहमति ज़रूरी है, तो यह अप्रत्यक्ष रूप से यह भी मानता है कि शादी को ही हमेशा सहमति नहीं माना जा सकता. उन्होंने हा कि घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम’ के तहत यौन शोषण को घरेलू हिंसा का ही एक रूप माना गया है.

उन्होंने सवाल पूछा कि अदालतों ने बार-बार यह माना है कि पति का जबरदस्ती यौन संबंध बनाना यौन शोषण है, जिसके लिए पत्नी के पास कानूनी उपाय हो सकते हैं. इससे सवाल ये भी उठता है कि अगर कानून शादी के अंदर जबरदस्ती यौन संबंध बनाने को ‘यौन शोषण’ मानता है, तो वही काम सिर्फ इसलिए आपराधिक दायित्व से कैसे बच सकता है क्योंकि दोनों साथ रह रहे हैं?.

 पुलिस ने रेप का केस दर्ज किया, कोर्ट ने हटा दिया

राय ने NDTV को बताया कि एक मामले में आरोप इतने गंभीर थे कि शिकायत पढ़ने के बाद पुलिस ने रेप का मामला दर्ज कर लिया. जांच अधिकारियों को खुद लगा कि आरोपों से अपराध की सभी शर्तें पूरी होती हैं. हालांकि, जब मामला कोर्ट पहुंचा, तो भयानक आरोपों पर चिंता जताने के बावजूद, कोर्ट को रेप का आरोप हटाना पड़ा क्योंकि आरोपी शिकायतकर्ता का पति था और मामला कानूनी छूट के दायरे में आता था.

उन्होंने कहा कि इस मामले में पति का व्यवहार रेपिस्ट जैसा ही था. पत्नी का ट्रॉमा भी रेप सर्वाइवर जैसा ही था. बस दोनों पक्षों के बीच कानूनी रिश्ता अलग था.

वैवाहिक रेप पर क्या है सरकार का रुख

अक्टूबर 2024 में केंद्र सरकार ने 49 पन्नों के हलफनामे में पहली बार BNS की धारा 63 (जो रेप को अपराध मानती है) के तहत शादी से जुड़ी छूट को हटाने का विरोध किया. सरकार ने जवाब में कहा कि हालांकि पति के पास कोई अधिकार नहीं है कि वह महिला को उसके मौलिक अधिकारों से वंचित रखे, लेकिन शादी की संस्था के तहत इस उल्लंघन को रेप बताना बहुत कठोर है, इसलिए, इसे असंगत माना जा सकता है.

इसमें कहा गया है कि वैवाहिक रेप को गैर-कानूनी और अपराध घोषित किया जाना चाहिए क्योंकि शादी करने से महिला की सहमति खत्म नहीं हो जाती. हालांकि, शादी के अंदर ऐसे उल्लंघनों के नतीजे शादी के बाहर होने वाले उल्लंघनों से अलग होते हैं. सरकार का मानना ​​था कि IPC और ‘घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005’ के अन्य प्रावधान ऐसे उल्लंघनों के लिए कड़ी सजा सुनिश्चित करने में सक्षम हैं.

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