

मध्य प्रदेश में समान नागरिक संहिता (UCC) लागू करने की दिशा में बड़ा कदम उठाया गया है. लंबे समय से जिस रिपोर्ट का इंतजार किया जा रहा था, वह अब सरकार को सौंप दी गई है. मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव को उच्च स्तरीय समिति ने UCC का अंतिम प्रतिवेदन सौंप दिया है.
इस रिपोर्ट के साथ प्रदेश में विवाह, तलाक, भरण-पोषण, उत्तराधिकार, दत्तक ग्रहण और लिव-इन संबंधों जैसे कई पारिवारिक विषयों से जुड़े कानूनों में बदलाव की प्रक्रिया आगे बढ़ सकती है. अब निगाहें इस बात पर हैं कि राज्य सरकार रिपोर्ट की सिफारिशों पर कितना जल्दी अमल करती है और विधानसभा में इसे कब पेश किया जाता है.
मुख्यमंत्री को सौंपी गई अंतिम रिपोर्ट
सोमवार को समान नागरिक संहिता के लिए गठित उच्च स्तरीय समिति ने मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव को अपनी अंतिम रिपोर्ट सौंप दी. इस अवसर पर समिति के सदस्य प्रो. गोपाल शर्मा, बुधपाल सिंह, शोभा पैठणकर और सदस्य सचिव अजय कटेसरिया मौजूद रहे. मुख्यमंत्री ने तय समय-सीमा में रिपोर्ट तैयार कर सौंपने पर समिति के सभी सदस्यों का आभार व्यक्त किया.
तीन खंडों में तैयार की गई रिपोर्ट
समिति ने अपनी रिपोर्ट को तीन अलग-अलग खंडों में तैयार किया है. पहले खंड में समिति की अनुशंसाएं और विभिन्न कानूनों, परंपराओं तथा व्यवस्थाओं का विस्तृत अध्ययन शामिल किया गया है. इसमें अंतरराष्ट्रीय, राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर लागू व्यवस्थाओं का विश्लेषण करते हुए सुझाव दिए गए हैं. इस खंड में कुल 10 अध्याय शामिल हैं.
404 धाराओं वाला विधेयक का मसौदा तैयार
रिपोर्ट का दूसरा खंड सबसे महत्वपूर्ण माना जा रहा है. इसमें UCC विधेयक का प्रारूप तैयार किया गया है. समिति ने मध्य प्रदेश की वर्तमान व्यवस्थाओं और नियमों को ध्यान में रखते हुए यह ड्राफ्ट बनाया है. प्रस्तावित विधेयक में 4 भाग, 404 धाराएं और 7 अनुसूचियां शामिल हैं. यही मसौदा आगे चलकर कानून का आधार बन सकता है.
9.58 लाख से ज्यादा लोगों से लिया गया फीडबैक
रिपोर्ट का तीसरा खंड जन-परामर्श से जुड़ा हुआ है. समिति ने जिला और राज्य स्तर पर लोगों की राय जानने के साथ-साथ वेबसाइट के माध्यम से भी सुझाव प्राप्त किए. समिति को कुल 9.58 लाख से अधिक सुझाव और परामर्श प्राप्त हुए. रिपोर्ट में इन सुझावों का प्रश्नवार, लिंगवार और समुदायवार विश्लेषण भी शामिल किया है.
अनुसूचित जनजातियों को बाहर रखने की सिफारिश
समिति ने अपनी रिपोर्ट में अनुसूचित जनजातियों (ST) को समान नागरिक संहिता के दायरे से बाहर रखने की अनुशंसा की है. यह सुझाव प्रदेश की सामाजिक और सांस्कृतिक परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए दिया है. राज्य में बड़ी आदिवासी आबादी होने के कारण यह सिफारिश काफी महत्वपूर्ण मानी जा रही है.
किन विषयों पर किया अध्ययन?
राज्य सरकार ने समिति को विवाह, तलाक, भरण-पोषण, उत्तराधिकार, दत्तक ग्रहण और लिव-इन रिलेशनशिप जैसे व्यक्तिगत एवं पारिवारिक विषयों का अध्ययन करने की जिम्मेदारी दी थी. समिति ने इन सभी विषयों पर मौजूदा कानूनों, सामाजिक परंपराओं और संवैधानिक प्रावधानों का अध्ययन कर अपनी सिफारिशें तैयार की हैं.
लैंगिक समानता पर रहा विशेष जोर
समिति का कहना है कि रिपोर्ट तैयार करते समय लैंगिक समानता को प्रमुख आधार बनाया गया है. साथ ही यह भी कोशिश की गई है कि समाज में प्रचलित रीति-रिवाजों और सांस्कृतिक परंपराओं का सम्मान बना रहे. रिपोर्ट में संवैधानिक मूल्यों और सामाजिक संतुलन दोनों को ध्यान में रखकर सुझाव दिए गए हैं.
अब आगे क्या होगा?
समिति की रिपोर्ट राज्य सरकार के विधि विभाग को भेज दी गई है. अब विधि विभाग इसकी कानूनी समीक्षा करेगा और आवश्यक संशोधन किए जाएंगे. इसके बाद मामला वरिष्ठ सचिव समिति के पास जाएगा. वहां से मंजूरी मिलने के बाद प्रस्तावित विधेयक को मंत्रिपरिषद के सामने रखा जाएगा. कैबिनेट की स्वीकृति मिलने के बाद इसे विधानसभा के मानसून सत्र में पेश किए जाने की संभावना है.





