
वर्ष 2026 के शारदीय नवरात्रे चल रहे हैं. नवरात्रि का अर्थ है “नौ रातें”. इन नौ रातों और दस दिन के दौरान देवी शक्ति के नौ रूपों की पूजा की जाती है और दसवें दिन दशहरा पर्व होता है. तीन महादेवियों ‘महालक्ष्मी, महासरस्वती और दुर्गा’ के नौ स्वरूप को ही नवदुर्गा कहा जाता है. यह पापों की विनाशिनी हैं. शास्त्रों के मतानुसार नवदुर्गा नौ विशिष्ट औषधियों में विराजमान हैं.
दुर्गा का मतलब ही है दुःख को हटाने वाली, दुःखों को हरने वाली. शक्ति की उपासना का पर्व, शारदीय नवरात्र, प्रतिपदा से नवमी तक निश्चित नौ तिथि, नौ नक्षत्र, नौ शक्तियों के साथ सनातन काल से मनाया जाता रहा है. नवरात्रि के दौरान शक्ति, धन, समृद्धि और ज्ञान की प्राप्ति के लिए देवी के विभिन्न रूपों की पूजा की जाती है. श्रीराम ने भी इन्हीं शारदीय नवरात्रों में उपवास और शक्ति पूजा की थी और दसवें दिन लंका पर विजय प्राप्त की. इस त्योहार को महिषासुर वध से भी जोड़ा जाता है.
देश भर में नवरात्रि की विविध परंपराएं
नवरात्रि भारत में अलग-अलग तरह से मनाई जाती है. गुजरात में डांडिया और गरबा के रूप में मनाया जाता है. यह देवी की आराधना में भक्तितत्त्व है. पश्चिम बंगाल में तो दुर्गा पूजा मुख्य त्योहार है. यह दक्षिण में मैसूर में विशेष रूप से मनाई जाती है. यहां नवरात्रे में देवी चामुंडेश्वरी का पूजन और स्तुतिगान होता है.
माता चामुंडेश्वरी द्वारा महिषासुर के वध के कारण ही मैसूर नाम पड़ा. मैसूर महल में नवरात्रे और दशहरा के समय आकर्षक दरबार सजता है. स्थानीय परंपरानुसार अस्त्र-शस्त्र का पूजन होता है. इसका प्रचलन भारत के अन्य भागों में भी है.
ऋतु परिवर्तन, उपवास और स्वास्थ्य विज्ञान
नवरात्रि वर्ष में चार बार क्रमशः चैत्र, आषाढ़, आश्विन और माघ की शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से नवमी के बीच आती है. इन चार में दो प्रमुख हैं, एक वसंत और दूसरा शरद ऋतु से संबंधित. यह इसका प्राकृतिक महत्त्व है, जो अप्रत्यक्ष रूप से परंपरा का हिस्सा बना. नवरात्रि वसंत की शुरुआत और शरद ऋतु की शुरुआत का संदेश लेकर आती है. जलवायु और सूर्य के स्थान का परिवर्तन और उनके प्रभावों को प्रदर्शित करने का पर्व है. यह दो ऋतुओं का संगमकाल भी है.
चौमासे में जो कार्य स्थगित थे, उनके आरंभ करने का यह समय है. नवरात्रि पर्व, मां दुर्गा की अवधारणा और शक्ति की पूजा है. यह शुभकाल है. यह पूजा वैदिक काल से पूर्व प्रागैतिहासिक काल से चली आ रही है. नवरात्रि के दौरान उपवास स्वास्थ्य और समृद्धि के संरक्षण के लिए रखते हैं. अधिकांश भक्त इस दौरान मांस या अन्य तामसिक भोजन नहीं करते.
नवरात्रि मौसम परिवर्तन का काल है. इस दौरान शरीर की पाचनशक्ति कमजोर होती है. शरीर की अपनी ऊर्जा ऋतु-परिवर्तन के अनुकूल बनाने में लगी होती है. ऐसे में गरिष्ठ भोजन से बचना स्वास्थ्य के लिए हितकारी है. उपवास के दौरान हम अपने शरीर का शुद्धीकरण कर लेते हैं. उपवास शरीर में पड़े अपच भोज्य को नष्ट करके अंदर से हमें स्वच्छ करता है.
नौ दिन तक उपवास हमारे आत्मबल को भी बढ़ाता है. इस दौरान भक्त अन्य बुरी लतों से बचने का संकल्प लेते हैं. इस तरह से यह पर्व जन-जन के आत्म-निरीक्षण और शुद्धि का पर्व बन जाता है. यह हमारी नकारात्मकता को समाप्त कर हमें सकारात्मक बनाता है, जो आज के युग के लिए अति आवश्यक है.
देवी भागवत पुराण: ब्रह्मा जी के सम्मुख भगवती का वचन
देवी भागवत पुराण में भगवान ब्रह्मा के प्रश्नों का उत्तर देते हुए देवी भगवती जगदम्बा कहती हैं:
“मैं और परब्रह्म सदा एक ही हैं, हमारे बीच कोई भेद नहीं है; क्योंकि जो वे हैं, वही मैं हूं, और जो मैं हूं, वही वे हैं. केवल बुद्धि के भ्रम से ही हम दोनों में भेद दिखायी पड़ता है. सृष्टि के प्रलयकाल में मैं न स्त्री हूं, न पुरुष हूँ और न ही नपुंसक हूँ. परंतु जब पुनः सृष्टि होने लगती है, तब पूर्ववत् यह भेद बुद्धि के द्वारा उत्पन्न हो जाता है.
मैं ही बुद्धि, श्री, धृति, कीर्ति, स्मृति, श्रद्धा, मेधा, दया, लज्जा, क्षुधा, तृष्णा, क्षमा, कान्ति, शान्ति, पिपासा, निद्रा, तन्द्रा, जरा, अजरा, विद्या, अविद्या, स्पृहा, वाञ्छा, शक्ति, अशक्ति, वसा, मज्जा, त्वचा, दृष्टि, सत्यासत्य वाणी, परा, मध्या, पश्यन्ती आदि वाणी के भेद और जो विभिन्न प्रकार की नाड़ियां हैं, वह सब मैं ही हूँ. इस संसार में मैं क्या नहीं हूँ और मुझसे अलग कौन-सी वस्तु है? इसलिये ब्रह्मा जी आप यह निश्चित रूप से जान लीजिये कि सब कुछ मैं ही हूं.”
देवी आगे कहती हैं:
“इस सृष्टि में सर्वत्र मैं ही व्याप्त हूं. निश्चित ही मैं समस्त देवताओं में भिन्न-भिन्न नामों से विराजती हूं तथा शक्ति रूप से प्रकट होती हूं और पराक्रम करती हूं. मैं ही गौरी, ब्राह्मी, रौद्री, वाराही, वैष्णवी, शिवा, वारुणी, कौबेरी, नारसिंही और वासवी शक्ति के रूप में विद्यमान हूं. सब कार्यों के उपस्थित होने पर मैं उन देवताओं में प्रविष्ट हो जाती हूं और देव विशेष को निमित्त बनाकर सब कार्य सम्पन्न कर देती हूं.”
“जल में शीतलता, अग्नि में उष्णता, सूर्य में प्रकाश और चन्द्रमा में ज्योत्स्ना के रूप में मैं ही इच्छानुसार प्रकट होती हूं. संसार का कोई भी जीव मेरे बिना स्पन्दन भी करने में समर्थ नहीं हो सकता. इसी प्रकार यदि मैं शिव को छोड़ दूं तो वे शक्तिहीन होकर दैत्यों का संहार करने में समर्थ नहीं हो सकते. इसीलिये तो संसार में भी अत्यन्त दुर्बल पुरुष को लोग शक्तिहीन कहते हैं.
लोग अधम मनुष्य को विष्णुहीन या रुद्रहीन नहीं कहते बल्कि उसे शक्तिहीन ही कहते हैं. जो गिर गया हो, स्खलित हो गया हो, भयभीत हो, निश्चेष्ट हो गया हो अथवा शत्रु के वशीभूत हो गया हो, वह संसार में अरुद्र नहीं कहा जाता, अपितु अशक्त ही कहा जाता है.”
समस्त देवों और चराचर जगत का आधार: शक्ति
ब्रह्मा जी को समझाते हुए माता भगवती कहती हैं:
“ब्रह्माजी आप भी जब सृष्टि करना चाहते हैं तब उसमें शक्ति ही कारण है. जब आप शक्ति से युक्त होते हैं तभी सृष्टिकर्ता हो पाते हैं. इसी प्रकार विष्णु, शिव, इन्द्र, अग्नि, चन्द्रमा, सूर्य, यम, विश्वकर्मा, वरुण और वायुदेवता भी शक्ति-सम्पन्न होकर ही अपना-अपना कार्य सम्पादित करते हैं. पृथ्वी भी जब शक्ति से युक्त होती है, तब स्थिर होकर सबको धारण करने में समर्थ होती है.
यदि वह शक्तिहीन हो जाय तो एक परमाणु को भी धारण करने में समर्थ न हो सकेगी. शेषनाग, कच्छप एवं दसों दिग्गज मेरी शक्ति पाकर ही अपने-अपने कार्य सम्पन्न करने में समर्थ हो पाते हैं. यदि मैं चाहूं तो सम्पूर्ण संसार का जल पी जाऊं, अग्नि को नष्ट कर दूँ और वायु की गति रोक दूं, मैं जैसा चाहती हूं वैसा करती हूं.”
ब्रह्मा जी से ऐसा कहने के बाद देवी भगवती कहती हैं, “जब कभी भी देवताओं के समक्ष दैत्यों से भय उत्पन्न होगा, उस समय सुन्दर रूपों वाली वाराही, वैष्णवी, गौरी, नारसिंही, सदाशिवा तथा अन्य देवियों के रूप में मेरी शक्तियां प्रकट होकर उनका भय दूर कर देंगी.”
देवी भगवती ने अपनी शक्ति स्वरूप महासरस्वती को ब्रह्मा जी को, महालक्ष्मी को विष्णु जी को और महाकाली गौरी को भगवान शंकर को सौंपा.
आदिनारायणी शक्ति और दश महाविद्याओं का विस्तार
शारदीय नवरात्रों में देवी के विराट स्वरूप का पाठ करने का विशेष महत्त्व है. वास्तव में महाशक्ति ही परब्रह्म के रूप में प्रतिष्ठित हैं, जो विभिन्न रूपों में अनेक लीलाएं करती रहती हैं. उन्हीं की शक्ति से ब्रह्मा विश्व का सृजन करते हैं, विष्णु पालन करते हैं और शिव संहार करते हैं, अतः ये ही जगत् का सृजन-पालन-संहार करने वाली आदिनारायणी शक्ति हैं.
ये ही महाशक्ति नौ दुर्गाओं तथा दस महाविद्याओं के रूप में प्रतिष्ठित हैं और ये ही महाशक्ति देवी अन्नपूर्णा, जगद्धात्री, कात्यायनी, ललिता तथा अम्बा हैं. गायत्री, भुवनेश्वरी, काली, तारा, बगला, षोडशी, त्रिपुरा, धूमावती, मातंगी, कमला, पद्मावती, दुर्गा आदि देवियाँ इन्हीं भगवती के ही रूप हैं. ये ही शक्तिमती हैं और शक्ति हैं, ये ही नर हैं और नारी भी हैं.
‘सर्वं खल्विदमेवाहं नान्यदस्ति सनातनम्’
शक्ति से रहित हो जाना ही शून्यता है. शक्तिहीन मनुष्य का कहीं भी आदर नहीं किया जाता है.
- ध्रुव तथा प्रह्लाद भक्ति-शक्ति के कारण ही पूजित हैं.
- गोपिकाएं प्रेम शक्ति के कारण ही जगत में पूजनीय हुईं.
- हनुमान तथा भीष्म की ब्रह्मचर्य शक्ति,
- वाल्मीकि तथा व्यास की कवित्व शक्ति,
- भीम तथा अर्जुन की पराक्रम शक्ति,
- हरिश्चन्द्र तथा युधिष्ठिर की सत्य शक्ति ही इन महात्माओं के प्रति श्रद्धा-समादर अर्पित करने के लिये सभी लोगों को प्रेरणा प्रदान करती है.
सभी जगह शक्ति की ही प्रधानता है. श्रीमद्देवीभागवत पुराण के प्रथम स्कन्ध के अध्याय 15 के श्लोक 52 में देवी भगवती स्वयं उद्घोष करती हैं:
‘सर्वं खल्विदमेवाहं नान्यदस्ति सनातनम्’
(अर्थात् समस्त जगत् मैं ही हूं, मेरे अतिरिक्त अन्य कुछ भी सनातन तत्त्व नहीं है.)
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