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Explainer: क्या ट्रेन से बेडरोल चुराने जैसी छोटी चोरियां विकसित भारत के सपने को पीछे धकेल रही हैं? | Explainer: What is Indias honesty deficit and why does it matter?


अगर आपसे ये पूछें कि ट्रेन में बेडरोल की चोरी करने वाले हों या जी20 समिट के बाद फूल के गमले की चोरी करने वाले या फिर मैनहोल से ढक्कन गायब करने वाले, इन सब में क्या समानता है. तो शायद एक नजर में कोई समानता नजर न आए पर थोड़ी गहराई से देखें तो ये तीनों ही एक सच्चाई बताती हैं कि इन्हें हम नजरअंदाज कर देते हैं.   

पर ये भारत में बढ़ती छोटी-छोटी बेईमानियों को दिखाते हैं. और इन पर बात करो तो सुनने को एक कहावत जरूर मिलेगा. दरअसल, भारत में एक पुरानी कहावत है कि ‘ईमानदार वही है जिसे बेईमानी करने का मौका नहीं मिला.’ लोग इसे मजाक मान लेते हैं पर अगर चोरी या बेईमानी करने का मौका न मिलने वाले ही आज केवल ईमानदार हैं तो यह सवाल उठता है कि समाज के तौर पर हम आज कहां खड़े हैं?

क्योंकि असल ईमानदारी तो खुद से होती है, आप तब भी उतने ही ईमानदार होते हैं जब न कोई इंसानी निगाह या कैमरे आपकी निगरानी न कर रहे हों, तो ये असल ईमानदारी है. यानी असल ईमादारी तब होती है जब कोई देख नहीं रखा होता और इंसान गलत काम न करे.

रेलवे का आंकड़ा, जिसने सबको चौंका दिया

हाल ही में एक RTI से सामने आए आंकड़े बेहद हैरान करने वाले हैं. जनवरी 2022 से मई 2026 के बीच भारतीय रेलवे से 1.27 करोड़ से ज्यादा बेडरोल आइटम चोरी हो गए. इनमें 46.54 लाख फेस टॉवल, 41.13 लाख चादरें, 23.59 लाख तकिए के कवर, 12.95 लाख कंबल और 2.76 लाख तकिए शामिल हैं. इस चोरी के कारण रेलवे को सिर्फ चार साल में ही 104.51 करोड़ रुपये का आर्थिक नुकसान हुआ है.

सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि 2022 से 2025 के बीच इन चोरियों में करीब 56 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज हुई.

अब सवाल यह नहीं है कि एक चादर कितनी महंगी थी. सवाल ये है कि लाखों लोग बिना किसी शर्म के ऐसी चीज अपने साथ घर क्यों ले जाते हैं ,जो उनकी है ही नहीं.

चोरी की ऐसी घटना की गवाही केवल रेलवे ही नहीं दे रही बल्कि आपको याद होगा जब 2023 में जी20 समिट का आयोजन किया गया था तब दिल्ली के भारत मंडपम और प्रगति मैदान के आसपास लगाए गए सजावटी गमलों की चोरी होने की खबरें आई थीं.

गुरुग्राम में ऐसे कई वीडियो सामने आए थे जिनमें लोग गाड़ियों में गमले भर-भर कर ले जाते दिखे थे. हैरानी की बात तो ये है कि चोरी करने वाले लोग महंगी गाड़ियों में आए थे. 

बाद में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी सार्वजनिक कार्यक्रम में इस घटना का जिक्र करते हुए कहा था कि जिन लोगों के पास सब कुछ था, वे भी गमले उठा ले गए.

गमले ही नहीं बल्कि लोग सड़कों से मैनहोल के ढक्कन चोरी कर रहे हैं. नई सड़कों की लोहे की रेलिंग गायब कर रहे हैं. स्ट्रीट लाइट की वायर चोरी हो रही है. नालियों पर लगाई गई जालियां गायब हो रही हैं. सरकारी पार्कों से लोहे की बेंच गायब की जा रही हैं. 

सोचिए क्या एक मैनहोल का ढक्कन चोरी होने का मतलब सिर्फ लोहे का नुकसान है? जी नहीं, बारिश में वही खुला गड्ढा किसी की जान भी ले सकता है. यानी एक छोटी चोरी का असर कई बार इतना बड़ा भी हो सकता है जिसकी आप कल्पना भी नहीं कर सकते.

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क्या इसकी वजह सिर्फ गरीबी है?

अक्सर चोरी की सबसे बड़ी वजह गरीबी बताई जाती है. लेकिन क्या इसमें हमेशा सच्चाई होती है? क्या एसी में सफर कर रहा वो व्यक्ति गरीब है जो बेडरोल चुरा रहा है. या एसयूवी में बैठ कर गमले चुराने वाला वो शख्स गरीब है. यानी इन चोरियों को किसी कमी की वजह से अंजाम नहीं दिया गया, बल्कि यह एक मानसिकता है. 

सरकारी सामानों पर हाथ साफ करने वाले सरकार की चीजों को किसी की संपत्ति नहीं मानते. जबकि सच यह है कि सरकारी संपत्ति किसी अधिकारी की नहीं होती. वह देश के हर नागरिक यानी सार्वजनिक संपत्ति होती है.

छोटी बेईमानी कब सामान्य बन गई? यही सबसे बड़ा सवाल है. आज अगर कोई ऑफिस से पेन उठा लाए. रेलवे की चादर घर ले आए. सरकारी गमले उठा ले आए. तो कई लोग इसे चोरी नहीं मानते. यानी समाज में छोटी-छोटी बेईमानी धीरे-धीरे सामान्य होती जा रही है. और जब छोटी बेईमानी सामान्य हो जाती है तो बड़ी बेईमानी भी उतनी गलत नहीं लगती.

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Photo Credit: NCRB

क्राइम ब्यूरो के हैरान करने वाले आंकड़े

चोरी, डकैती, लूट और सेंधमारी जैसी घटनाओं में लगातार वृ्द्धि देखने को मिल रही है. राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के आंकड़े बताते हैं कि ट्रेन में बेडरोल चोरी की जो घटना हुई, वो इस बहुत बड़ी समस्या का महज एक हिस्सा भर है.  साल 2024 के दरम्यान पूरे भारत के आवासीय परिसरों में ऐसे लगभग 7.55 लाख मामले दर्ज किए गए. मतलब कि हर दो मिनट में औसतन ऐसे तीन अपराध दर्ज किए गए. ये वो मामले हैं जिनकी रिपोर्ट दर्ज करवाई गईं.  

विभिन्न शोध में बताया गया है कि बड़ी संख्या में चोरी और इस तरह के वारदातों की रिपोर्ट महानगरों में दर्ज तक नहीं करवाई जाती हैं. 

अब तो धोखाधड़ी ने भी एक नया शक्ल अख्तियार कर लिया है. धोखाधड़ी भी ऑनलाइन हो चला है. साइबर अपराध में आई तेजी और बड़ी मात्रा में लोगों से उनकी गाढ़ी कमाई लूटने की घटनाएं ऑनलाइन माध्यमों से आए दिन अंजाम दी जा रही हैं.

पर चोरी की इन समस्याओं का स्तर हमें एक मुश्किल सवाल पूछने के लिए बाध्य करता हैः अगर भारत सबसे तेजी से बढ़ती एक इकोनॉमी है तो क्यों रोजमर्रा की जिंदगी में इस स्तर की बेईमानी इतनी धड़ल्ले से क्यों हो रही है?

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आखिर नुकसान किसका होता है?

लोग सोचते हैं. सामान तो सरकार का है. लेकिन असलियत तो अलग है. नई चादर भले ही जनता के पैसे यानी टैक्स के पैसों से खरीदे जाते हैं पर  रेलवे अधिकारियों के मुताबिक बेडरोल चोरी होने का नुकसान कई बार ठेकेदारों और कर्मचारियों तक पहुंचता है. सड़क पर वायर का दोबारा लगाया जाना हो या मेलहोल का नया ढक्कन, हर बार पैसे आम आदमी के टैक्स के पैसे ही लगते हैं. यानी चोरी किसी आम आदमी ने किया तो उसका भुगतान भी वो आम आदमी कर रहा है जो टैक्स भरता है.

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ऐसे में ब्रांड इंडिया का क्या?

भारत चाहता है कि वो ग्लोबल पावर बने पर ऐसी घटनाएं हमारे देश को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कैसे देखा जा रहा है उस पर नकारात्मक असर डालती हैं. विदेशों में दुकानों या होटलों से चोरी करते भारतीय हों या सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाते भारतीयों की सीसीटीवी फुटेज, हर बार ऐसी घटनाएं ब्रांड इंडिया के इमेज को चोट पहुंचाते हैं. ये नुकसान इतना होता है जिसकी कई लोगों को सुध तक नहीं है. किसी देश की प्रतिष्ठा केवल उसकी इकोनॉमी, टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में उपलब्धियों या राजनयिक प्रभाव से ही नहीं होता, बल्कि उस देश के नागरिकों के व्यवहार से भी होता है.

बेशक भारत का जीडीपी दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती इकोनॉमी की हो लेकिन एक राष्ट्र के तौर पर केवल इससे ही भरोसा, विश्वसनीयता और इज्जत नहीं मिलेगी. भ्रष्टाचार सूचकांक ये दिखाता है कि भारत शासन से जुड़ी चुनौतियों से जूझ रहा है. हालांकि भ्रष्टाचार और छोटी-मोटी चोरियां एक जैसे मुद्दे बिल्कुल नहीं हैं, लेकिन ये दोनों ही नैतिकता, जवाबदेही और जनविश्वास से जुड़ी एक व्यापक चुनौती को दर्शाते हैं.

Japan fans clean stadium after match

खेल आयोजन के बाद स्टेडियम की सफाई करते फैन
Photo Credit: AFP

विकसित देशों से क्या सीख सकते हैं?

जापान का उदाहरण अक्सर दिया जाता है, जहां खोए हुए बटुए और कीमती सामान अक्सर उनके मालिकों को लौटा दिए जाते हैं. अंतरराष्ट्रीय खेल आयोजनों के खत्म होने के बाद जापानी दर्शक अक्सर स्टेडियमों की सफाई में मदद भी करते हैं, जिसके लिए उनकी सराहना भी की जाती है. इससे केवल अच्छी छवि नहीं बनती. लोगों पर नजर रखने, पुलिसिंग, टूटे हुए सामानों के मरम्मत जैसे कार्यों पर सरकार का खर्च भी कम होता है. सार्वजनिक व्यवस्थाएं और कुशल हो जाती हैं क्योंकि आम जनता स्वेच्छा से सहयोग करती है. इससे संस्थाएं मजबूत होती हैं, लागत घटता है और समाज में आपसी भरोसा बढ़ता है. यही भरोसा किसी भी विकसित देश की सबसे बड़ी ताकत होता है.

प्रतीकात्मक तस्वीर

प्रतीकात्मक तस्वीर

‘चलता है’ से ‘बदल सकता है’ तक

यह समस्या हर जगह सीसीटीवी लगाने से खत्म नहीं होगी. हर ऐसी छोटी-छोटी चोरी से जेल भेजने पर भी समस्या का समाधान नहीं होगा. कानून का काम दंड देना है, चरित्र का निर्माण करना नहीं. ईमानदारी कानून नहीं सिखा सकता. यह घर, स्कूल और समाज से मिलने वाली सीख है और उन लोगों से जिन्हें बच्चे अपना आदर्श मानते हैं. 

यह कोई ऐसा चैप्टर नहीं है जिसे पढ़ कर इंसान बाद में भूल जाता हो. इसे ताउम्र जागृत रखना होता है क्योंकि ईमानदार इंसान वहीं होता है जो चाहे कितनी भी विपरीत परिस्थितियां क्यों न हो, ईमानदारी का दामन ही थामता है. 

हमें सिर्फ मौलिक अधिकारों की बात ही नहीं करना होगी, हमें मौलिक कर्तव्यों की बात भी उतनी ही करनी होगी. बेशक एक इकोनॉमी के तौर पर भारत तेजी से आगे बढ़ रहा है. नई सड़कें बन रही हैं. बुलेट ट्रेन के आने की तैयारी चल रही है. मेट्रो नेटवर्क का तेजी से कई शहरों तक विस्तार हो रहा है. हमारी अर्थव्यवस्था की तारीफ भी की जा रही है, लेकिन अगर हम सार्वजनिक संपत्ति की अपनी संपत्ति के तौर पर रक्षा नहीं करेंगे तो विकास का सपना अधूरा रहेगा.

फिर रेलवे से 104 करोड़ रुपये के बेडरोल की चोरी हो, जी20 के गमले गायब हो जाएं या मैनहोल के ढक्कन की चोरी… ये सभी हमारे सामाजिक चरित्र का आईना हैं. किसी देश की छवि केवल जीडीपी या उसकी सरकार से नहीं बनती बल्कि यह उसके नागरिकों के कार्यों से बनती है. और शायद यह विकसित भारत बनने की एक अहम लड़ाई भी है. 

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