धर्म

Nirjala Ekadashi 2026: 300 साल बाद निर्जला एकादशी पर महासंयोग, भूलकर भी आज न करें ये 5 गलतियां


Nirjala Ekadashi 2026: सनातन धर्म में एकादशी व्रत को सबसे पवित्र और फलदायी माना गया है. लेकिन ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की निर्जला एकादशी का महत्व सबसे अलौकिक है. इस बार की निर्जला एकादशी इतिहास के पन्नों में दर्ज होने जा रही है. ज्योतिषीय गणना के अनुसार, लगभग 300 वर्षों के बाद ऐसा दुर्लभ संयोग बना है, जहां ज्येष्ठ मास ‘अधिक मास’ के रूप में आया है. इस विशेष खगोलीय और धार्मिक स्थिति के कारण इस वर्ष साल में 24 नहीं, बल्कि कुल 26 एकादशी के व्रत रखे जा रहे हैं.

भीषण गर्मी के बावजूद आज धर्मनगरी हरिद्वार, प्रयागराज और काशी सहित उत्तर भारत के तमाम पवित्र घाटों पर आस्था का सैलाब उमड़ पड़ा है. श्रद्धालु पतित पावनी मां गंगा में डुबकी लगाकर दान-पुण्य कर रहे हैं.

महाभारत काल से जुड़ा है इस महाव्रत का महत्व

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, महाभारत काल में महर्षि वेदव्यास जी ने महाबली भीम से कहा था कि यदि वह वर्ष भर की सभी एकादशियों का व्रत रखने में असमर्थ हैं, तो उन्हें केवल इस एक ‘निर्जला एकादशी’ का व्रत पूर्ण श्रद्धा से रखना चाहिए. ऐसा करने से साल भर की सभी 24 एकादशियों का पुण्य फल अकेले इस एक व्रत से प्राप्त हो जाता है.

धार्मिक नियम: शास्त्रों के अनुसार, एकादशी के दिन अन्न का सेवन पूरी तरह वर्जित है. चूंकि निर्जला एकादशी में अन्न के साथ-साथ जल का भी पूरी तरह त्याग किया जाता है, इसलिए इसे सबसे कठिन और दिव्य तप माना गया है.

गंगा दशहरा और पितृ तर्पण का दिव्य योग

इस महाव्रत का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि इसके ठीक पहले गंगा दशहरा का पर्व मनाया जाता है, जिस दिन मां गंगा का पृथ्वी पर अवतरण हुआ था. मान्यता है कि गंगा जी का केवल स्मरण करने मात्र से ही मनुष्य के शारीरिक, मानसिक और वाणी से जुड़े दोष नष्ट हो जाते हैं. इस पावन अवसर पर गंगा स्नान और व्रत रखने से न केवल श्रद्धालुओं को पुण्य मिलता है, बल्कि पूर्वजों और पितरों का भी तर्पण होता है.

भीषण गर्मी में ‘जल और वायु’ के दान का महत्व

यह व्रत ज्येष्ठ मास की तपती गर्मी में आता है, इसलिए इस दिन जल और वायु से संबंधित वस्तुओं के दान को सर्वोत्तम माना गया है. शास्त्रों का नियम है कि हम जिस चीज का जितना अधिक नि:स्वार्थ दान करते हैं, ईश्वर हमें वह उतनी ही अधिक मात्रा में वापस लौटाते हैं.

आज के दिन श्रद्धालु निम्नलिखित सेवा कार्यों में बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रहे हैं:

  • जल सेवा (प्याऊ): राहगीरों के लिए ठंडे और शुद्ध जल से भरे मिट्टी के घड़े/कलश रखना और मीठा शरबत बांटना.
  • पंखों का दान: मंदिरों, अस्पतालों और अनाथालयों में हाथ से बने पंखों का दान करना.
  • जीव सेवा: बेजुबान पक्षियों और मूक जीवों के लिए छतों और बागों में मिट्टी के कुंडों (सकोरों) में पानी रखना.

अखाड़ा परिषद और प्रशासन के मुस्तैद इंतजाम

हरिद्वार के घाटों पर लाखों की संख्या में उमड़ी भीड़ को देखते हुए सुरक्षा के कड़े प्रबंध किए गए हैं.

अनुष्का (एएसपी, हरिद्वार): “मेले और स्नान पर्व को देखते हुए पुलिस प्रशासन ने सुरक्षा के कड़े प्रबंध किए हैं. घाटों पर भीड़ नियंत्रण, सीसीटीवी निगरानी और जल पुलिस की तैनाती की गई है ताकि श्रद्धालु सुरक्षित तरीके से गंगा स्नान कर सकें.”

महंत रवींद्र पुरी (अध्यक्ष, अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद): “आज के दिन गंगा में स्नान करके फल और जल का दान करने का विशेष आध्यात्मिक महत्व है. श्रद्धालुओं का कहना है कि आज किया गया दान अक्षय पुण्य प्रदान करता है.”

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