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आंदोलन, युवा पीढ़ी, हिंदू स्वभाव… नागपुर में दशहरा रैली पर मोहन भागवत का देश को संदेश, जानें 10 बड़ी बातें | Rashtriya Swayamsevak Sangh Chief Mohan Bhagwat Vijayadashami Utsav celebration Centenary Year Celebrations



नागपुर:

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत मंगलवार को नागपुर में शताब्दी वर्ष श्री विजयादशमी उत्सव में शामिल हुए. इस उत्सव की शुरुआत स्वयंसेवकों के पथ संचलन के साथ हुई. आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने इस दौरान शस्त्र पूजन भी किया. अपने संबोधन में मोहन भागवत ने कई अहम बातें कहीं. उन्होंने कहा कि आंदोलन से नहीं, बल्कि समाज के आपसी विचार से समाधान निकलता है. बांग्लादेश और नेपाल में क्या हुआ. रिजीम चेंज से कुछ नहीं बदला.

  1. मोहन भागवत ने कहा कि विविधता वाला भारत अंदर से एक है. अपना ध्यान उस पर होना चाहिए. नई गांठ खड़ी ना हो, नई विषमता खड़ी ना हो, झगड़ा लगाने वाले बैठे हैं. धैर्यपूर्वक अपने व्यवहार को रखकर समाज को संभालना होगा. जिनको झगड़ा लगाना है वो लगाते हैं. संघ के काम का आधार सबके प्रति शुद्ध सात्विक प्रेम है. हो भला समाज का वह कार्य करे चलो. हम लक्ष्य पूर्ण होने तक कार्य करते रहेंगे. सांप्रदायिक कट्टरता आई, तो अंग्रेज हमें बांटने के लिए बैठे थे. हमारा विभाजन हो गया. पहले अखंड भारत के जो अंग थे, उनमें आज भी कलह है.
  2. उन्होंने कहा कि पश्चिम से एक आंधी चली है. भारत में भी ऐसे प्रयास जारी हैं. भारत दृढता से चला है, समाज के पुरुषार्थ में वृद्धि हुई है. समस्या रहती है, आंदोलन होते हैं लेकिन वो समाधान के लिए होने चाहिए. उद्देश्य समाधान हो. हमारी करनी के कारण द्वेष पैदा नहीं होना चाहिए. मर्यादा का पालन होना चाहिए. वोट और सस्ती लोकप्रियता के लिए नहीं होनी चाहिए. लॉर्ड कर्झन ने बंगाल का विभाजन किया, समाज को तोड़ने के लिए, लेकिन एकता से समाज जाग गया. उसी से वंदे मातरम् आया, विभाजन वापस लेना पड़ा.
  3. सरसंघचालक ने कहा कि हमें अपनी विस्मृति को दूर कर उस तत्व को भी स्पष्ट रूप से समझना पड़ेगा, स्वीकार करना पड़ेगा और उसके अनुरूप गुणवत्तापूर्ण जीवन का सभी आयामों में निर्माण करना पड़ेगा. देश की स्वाधीनता के लिए जितनी तपस्या और समर्पण हुआ, उससे कहीं अधिक की आवश्यकता अब पड़ेगी, परिस्थिति को देखते हुए यह ध्यान में आता है.
  4. आरएसएस चीफ ने कहा कि पंच परिवर्तन की पांचों पहलों का (समरसता, कुटुंब प्रबोधन, पर्यावरण, स्व बोध व स्वदेशी और नागरिक अनुशासन) समाज के सभी वर्गों और स्तरों में स्वागत हुआ है. विश्व के अन्य देशों में भी इसकी आवश्यकता अनुभव की गई है. यह केवल एक वर्ष भर का कार्यक्रम नहीं, बल्कि जीवन में आचरण का परिवर्तन लाने वाली व्यवहार की शैली है.
  5. भागवत ने नई पीढ़ी को लेकर भी चिंता जताई. उन्होंने कहा कि विभिन्न माध्यमों से प्राप्त जानकारी बिना उचित-अनुचित का विवेक किए नई पीढ़ी ग्रहण करती है. उसके दुष्परिणामों का अनुभव होने के बाद विभिन्न देशों ने कुछ अनुशासन और प्रतिबंध लागू किए हैं. हमारे अपने देश में भी इस प्रकार की आवश्यकता, विशेष तौर पर ‘ओटीटी प्लेटफॉर्म’ को लेकर, समाज में अनुभव की जा रही है. शासन-प्रशासन को इसका विचार करना चाहिए.
  6. मोहन भागवत ने कहा कि विवेक के अभाव में ही विश्वभर में नई पीढ़ी नशीली दवाओं की आदत की शिकार हो रही है. नशा एक गंभीर राष्ट्रीय समस्या है और उसके परिहार के लिए समय रहते शासन-प्रशासन और समाज को प्रयास शुरू करने चाहिए. समाज की वर्तमान अभिभावक पीढ़ी को यह विवेक नई पीढ़ी को देना पड़ेगा.
  7. उन्होंने संतुलित और समग्र विकास की दृष्टि पर भी बात की. उन्होंने कहा कि विज्ञान और तकनीक की प्रगति मनुष्यों को भौतिक दृष्टि से सुखी जीवन जीने में, जीवन में ज्ञान और तर्क के आधार पर अपने व्यवहार को निर्दोष करने में मदद करती है. लेकिन यह भी ध्यान में रखना चाहिए कि तकनीक केवल साधन है. केवल उपभोगवादी या जड़वादी दृष्टिकोण से विकास होता है तो सुख-सुविधा के साथ उससे बड़ी हानि मोल लेनी पड़ती है.
  8. नेपाल का उदाहरण देते हुए मोहन भागवत ने कहा कि नेपाल में जिस भयंकर त्रासदी को झेलना पड़ा, हजारों मनुष्यों की जान चली गई, उसके मूल में कहीं न कहीं संपूर्ण हिमालय क्षेत्र में, जो भारत, तिब्बत, भूटान, चीन जैसे अनेक देशों से गुजरता है, उसमें चले एकांगी विकास का परिणाम है. ऐसे में विकास की समग्र और संतुलित दृष्टि का निर्माण होना आवश्यक है.
  9. मोहन भागवत ने कहा कि विज्ञान और तंत्र ज्ञान के साथ इकॉनॉमी के साथ इकॉलॉजी और एथिक्स का विचार करना होगा.  AI का उचित उपयोग और एथिक्स का पालन करना होगा. भारत की सनातन दृष्टी और उसके साथ सनातन की समन्वय और संस्कारों की दृष्टी विश्व को आवश्यक है. भारत विविधताओं से भरा देश है और विविधताओं को स्वीकार करना व उनकी रक्षा करना हमारी पारंपरिक पहचान रही है.
  10. आरएसएस प्रमुख ने कहा कि दुनिया को एक नया रास्ता देने का दायित्व भारत का है. हिंदू दृष्टी में किसी खास पूजा पद्धति की आवश्यकता नहीं. पूजा करते हैं कि नहीं यह अनिवार्यता भी नहीं है. इन सबसे ऊपर लक्ष्य है विश्व बंधुत्व, बंधुता और मानवता. संतों ने समाज को रास्ता दिखाया. राष्ट्र, निष्ठा और कर्तव्यबोध जरूरी है. एकता और प्रगति की राह पर चलना जरूरी है. सत्य की राह दिखाने वाला समाज आज भी मौजूद है. विभाजित होने की वजह से हम कमजोर हुए. एकता और प्रगति की राह पर चलना जरूरी है.

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