
चंडीगढ:
पंजाब में नशे के खिलाफ जंग के बीच डेढ़ महीने के भीतर सामने आई तीन घटनाओं ने राज्य में नशे की समस्या और इसके खिलाफ आवाज उठाने वालों की सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. कहीं नशे की उपलब्धता पर सवाल उठाने वाले कार्यकर्ता के साथ कथित मारपीट हुई, कहीं बेटे की नशे की लत का मुद्दा उठाने वाले पिता की जहरीला पदार्थ निगलने से मौत हो गई, तो अब नशा विरोधी कार्यकर्ता परविंदर सिंह झोटा की हत्या ने पूरे मुद्दे को फिर सुर्खियों में ला दिया है.
2 सितंबर: नशे का मुद्दा उठाने वाले मोहंजित सिंह के साथ कथित मारपीट
संगरूर जिले के सुनाम क्षेत्र के शेरों गांव के नशा विरोधी कार्यकर्ता मोहंजित सिंह ने 2 सितंबर को मुख्यमंत्री भगवंत मान के लोक मिलनी कार्यक्रम के दौरान नशे की आसान उपलब्धता का मुद्दा उठाया. रिपोर्ट के मुताबिक, वह एक मकान की छत पर चढ़कर काला झंडा लहरा रहे थे, तभी कथित तौर पर उन्हें नीचे खींचकर पीटा गया. बाद में पुलिस ने बताया कि मोहंजित सिंह के खिलाफ आठ मामले दर्ज थे, जिनमें कुछ एनडीपीएस एक्ट के तहत भी थे.

गुलजार सिंह की मौत से पंजाब में प्रदर्शन
7 सितंबर: बेटे की लत का दर्द बताने वाले गुलजार सिंह की मौत
महज पांच दिन बाद, 7 सितंबर को संगरूर जिले के दिड़बा क्षेत्र के तूर बंजारा गांव के गुलजार सिंह की जहरीला पदार्थ निगलने से मौत हो गई. रिपोर्ट के अनुसार, उन्होंने वित्त मंत्री हरपाल सिंह चीमा के सामने अपने बेटे की नशे की लत और इलाके में नशे की उपलब्धता को लेकर चिंता जताई थी. आरोप है कि उन्हें इस मुद्दे पर फटकार लगाई गई. इसके बाद उनकी मौत हो गई. यह घटना नशे की समस्या से जूझ रहे परिवारों की बेबसी और उनकी शिकायतों को सुने जाने की जरूरत पर गंभीर सवाल उठाती है.
14 अक्टूबर: परविंदर सिंह झोटा की हत्या से फिर उठा नशे का मुद्दा
अब 14 अक्टूबर को नशा विरोधी कार्यकर्ता परविंदर सिंह झोटा की हत्या ने पंजाब में नशे के खिलाफ चल रही मुहिम को लेकर बहस तेज कर दी है. उनकी हत्या ने एक बार फिर यह सवाल सामने ला दिया है कि राज्य में नशे के खिलाफ आवाज उठाने वाले लोगों की सुरक्षा और नशे के कारोबार पर प्रभावी कार्रवाई कितनी मजबूत है.
डेढ़ महीने में तीन घटनाएं, जवाब मांगते कई सवाल
इन तीनों घटनाओं की परिस्थितियां अलग-अलग हैं, लेकिन इनके केंद्र में पंजाब की नशे की समस्या और इससे जुड़े सामाजिक तनाव हैं. नशे की उपलब्धता पर उठते सवाल, इसकी गिरफ्त में फंसे परिवारों की पीड़ा और नशे के खिलाफ सक्रिय लोगों से जुड़ी घटनाएं सरकार और प्रशासन के सामने चुनौती पेश करती हैं. सवाल सिर्फ नशे के खिलाफ कार्रवाई का नहीं, बल्कि यह भी है कि नशे की समस्या से जूझ रहे लोगों की आवाज कितनी सुनी जा रही है और इस लड़ाई में सक्रि लोगों की सुरक्षा कैसे सुनिश्चित की जा रही है.
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