
Sarvapitri Amavasya 2026: इस बार श्राद्ध पक्ष की शुरुआत शनिवार को हुई थी और इसका समापन भी शनिवार को ही सर्वपितृ अमावस्या यानी शनिश्चरी अमावस्या के साथ होने जा रहा है. ज्योतिष शास्त्र के अनुसार ऐसा दुर्लभ और कल्याणकारी संयोग पूरे 60 साल बाद बना है. इसके साथ ही इस पावन तिथि पर हस्त नक्षत्र के मिलने से ‘गज छाया योग’ का निर्माण भी हो रहा है.
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, गज छाया योग में पितरों का तर्पण करने से उन्हें उनका भाग सहजता से प्राप्त हो जाता है और वे पूर्ण तृप्त होकर वंशजों को सुख-समृद्धि का आशीर्वाद देते हैं.
60 साल बाद दुर्लभ संयोग, बना गज छाया योग
पाल बालाजी ज्योतिष संस्थान जयपुर-जोधपुर के निदेशक, भविष्यवक्ता एवं कुंडली विश्लेषक डा. अनीष व्यास ने बताया कि श्राद्ध पक्ष 26 सितंबर को शनिवार (पूर्णिमा) के दिन शुरू हुआ था और इसका समापन 10 अक्टूबर को शनिवार के दिन ही हो रहा है.
ज्योतिष शास्त्र में इसे दुर्लभ और कल्याणकारी संयोग माना गया है. इस दिन ‘गज छाया योग’ भी रहेगा, जो अमावस्या तिथि पर हस्त नक्षत्र के संयोग से बनता है. ऐसी मान्यता है कि इस योग में पितरों का तर्पण करने से उनका हिस्सा उन्हें सहजता से प्राप्त हो जाता है और वे तृप्त होते हैं.
धार्मिक मान्यताओं में शनिदेव को कर्मफल दाता और पितरों का सेवक माना गया है. शनिवार को समाप्त होने वाले इस पितृ पक्ष में श्राद्ध, तर्पण और दान करने से पितृ दोष के साथ शनि दोष (साढ़े साती या ढैय्या) से भी मुक्ति मिलती है.
शनिश्चरी अमावस्या का महत्व: पितृ दोष और शनि पीड़ा से राहत
डा. अनीष व्यास के अनुसार, आश्विन अमावस्या शनिवार को पड़ने से शनिश्चरी अमावस्या का संयोग बन रहा है. करीब तीन साल बाद यह योग दोबारा बना है; इससे पूर्व 14 अक्टूबर 2023 को ऐसा संयोग देखा गया था.
शनि और पितृ दोष से मुक्ति: शनिवार शनि देव का दिन है और अमावस्या पितरों व कर्मों से जुड़ी तिथि है. दोनों के मिलने से शनि दोष, साढ़े साती और ढैय्या के नकारात्मक प्रभाव कम होते हैं.
अज्ञात तिथियों का श्राद्ध: जिन्हें अपने पूर्वजों की मृत्यु की निश्चित तिथि ज्ञात नहीं है या निर्धारित तिथि पर श्राद्ध छूट गया हो, वे सर्वपितृ अमावस्या पर सभी भूले-बिसरों का तर्पण और पिंडदान कर सकते हैं.
पंचबलि और ब्राह्मण भोज: ब्रह्म पुराण के अनुसार, उचित काल या स्थान पर पितरों के निमित्त श्रद्धापूर्वक दिया गया दान ही श्राद्ध है. इस दिन भोजन बनाकर कौवे, गाय और कुत्ते के लिए निकाला जाता है, क्योंकि मान्यता है कि पितर देव पशु-पक्षियों व ब्राह्मण रूप में आकर तर्पण स्वीकार करते हैं.
सर्वपितृ अमावस्या तिथि व समय
- अमावस्या तिथि प्रारंभ: 9 अक्टूबर, रात 09:35 बजे
- अमावस्या तिथि समाप्त: 10 अक्टूबर, रात 09:19 बजे
- श्राद्ध व तर्पण समय: 10 अक्टूबर को दिनभर तर्पण, पिंडदान, ब्राह्मण भोज और दान-पुण्य करना शुभ फलदायी रहेगा.
शनिश्चरी अमावस्या पर किए जाने वाले विशेष उपाय
डा. अनीष व्यास ने पितृ शांति और शनि कृपा प्राप्ति के लिए निम्नलिखित उपाय बताए हैं:
खीर का भोग: अक्षत (चावल) और दूध की खीर बनाकर जलते हुए कंडे (गोबर के उपले) पर पितरों के निमित्त आहुति दें. इससे पितृ दोष शांत होता है और मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं.
शनि पूजन व दीपदान: शाम के समय पीपल के वृक्ष के नीचे या शनि मंदिर में सरसों के तेल का दीपक जलाएं. शनि देव को सरसों का तेल अर्पित करें.
दान का विधान: काले तिल, सरसों का तेल, उड़द की दाल, काले वस्त्र और अन्न का जरूरतमंदों को दान करें.
सेवा कार्य: स्नान के पश्चात निर्धनों को भोजन कराएं तथा मूक पशु-पक्षियों के लिए दाना-पानी और घास की व्यवस्था करें.
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