
दशहरे पर रावण का पुतला जलता है तो मैदान तालियों से गूंज उठता है. लेकिन उसी दिन कुछ जगहों पर लोग उसकी मृत्यु का शोक मनाते हैं. कहीं उसे अपनी धरती का बेटा माना जाता है, तो कहीं दामाद या पूर्वज. यहां रावण से जुडी कहानी का वह हिस्सा याद किया जाता है, जो पुतला दहन के शोर में अक्सर पीछे छूट जाता है.
हालांकि, हर जगह की परंपरा एक जैसी नहीं है. रावण की पूजा करने का मतलब हमेशा यह नहीं कि वहां उसका दहन भी नहीं होता. मंदसौर की परंपरा तो इसी फर्क को सामने लाती है.
बिसरख: जिस रावण को देश जलाता है, उसे यहां अपना बेटा मानते हैं
ग्रेटर नोएडा के बिसरख गांव में दशहरे की पहचान रावण दहन से नहीं है. स्थानीय मान्यता में यह रावण की जन्मस्थली है. गांव के नाम को भी उसके पिता ऋषि विश्रवा से जोडा जाता है. यहां के शिव मंदिर और शिवलिंग के साथ विश्रवा तथा रावण की पूजा की कथाएं जुडी हैं. इन्हें स्थानीय आस्था के प्रसंग के रूप में समझना चाहिए.
गांव की परंपरा पर हुई रिपोर्टिंग में रामलीला और रावण दहन का आयोजन न करने का उल्लेख मिलता है. कुछ ग्रामीण दशहरे को रावण की मृत्यु के शोक से जोडते हैं और उसकी आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना करते हैं.
रामलीला कराने पर अनहोनी होने की कथाएं भी सुनाई जाती हैं. ये स्थानीय विश्वास हैं. इन्हें किसी दुर्घटना या मृत्यु का प्रमाणित कारण नहीं माना जा सकता. बिसरख की कहानी में रावण सिर्फ लंका का राजा नहीं, अपनी धरती से जुडा पात्र भी है.
मंदसौर: सुबह दामाद की पूजा, शाम को बुराई के वध की परंपरा
मध्य प्रदेश के मंदसौर में कहानी एक अलग मोड लेती है. खानपुरा क्षेत्र का नामदेव समाज स्थानीय मान्यता के अनुसार मंदोदरी को अपनी बेटी और रावण को दामाद का दर्जा देता है. इसी रिश्ते से यहां उसकी प्रतिमा की पूजा होती है.
प्रतिमा के सामने से कुछ महिलाओं के घूंघट निकालकर गुजरने की परंपरा भी रिपोर्ट की गई है. दशहरे पर समाज के लोग पूजा, आरती और प्रसाद वितरण करते हैं. लेकिन इस दृश्य को देखकर यह निष्कर्ष निकालना गलत होगा कि पूरा मंदसौर शोक में डूबा रहता है.
अक्टूबर 2024 की स्थानीय रिपोर्ट में समाज के पदाधिकारियों ने सुबह पूजा के बाद शाम को प्रतीकात्मक वध की परंपरा बताई थी. उनके अनुसार पूजा उसके अच्छे गुणों की होती है और वध बुराई का. यहां सम्मान और वध एक ही दिन की कहानी के दो हिस्से हैं.
जोधपुर: कुछ परिवारों के लिए रावण पूर्वज है
राजस्थान के जोधपुर में एक छोटे ब्राह्मण समुदाय के कुछ परिवार रावण को अपना पूर्वज मानते हैं. दशहरे पर उसके निधन का शोक मनाने और पूर्वज के रूप में स्मरण करने की परंपरा रिपोर्ट की गई है. इसे पूरे जोधपुर की परंपरा समझना सही नहीं होगा.
मंडोर को मंदोदरी का मायका मानने की स्थानीय कथा भी प्रचलित है. लेकिन रावण को दामाद मानना और खुद को उसका वंशज मानना अलग रिश्ते हैं. दोनों को एक ही कहानी में मिला देने से परंपरा का अर्थ बदल जाता है.
बैजनाथ: शिवभक्त रावण के सम्मान में नहीं जलता पुतला
हिमाचल प्रदेश के कांगडा जिले के बैजनाथ में रावण का पुतला न जलाने की स्थानीय परंपरा है. यहां यह विश्वास उसके शिवभक्त रूप और शिव मंदिर से जुडी कथाओं के आधार पर समझाया जाता है.
स्थानीय मान्यता में शिव के ऐसे भक्त का पुतला जलाना उचित नहीं माना जाता. इसी आस्था के चलते यहां दशहरे पर रावण दहन से दूरी रखी जाती है. यह धार्मिक विश्वास और स्थानीय परंपरा का विषय है.
हर जगह रावण से रिश्ता अलग है
इन जगहों की परंपराओं को सिर्फ रावण के भक्त कहकर समझ लेना आसान है. लेकिन करीब से देखने पर फर्क साफ होता है. बिसरख में जन्मस्थान की मान्यता है. मंदसौर के नामदेव समाज में दामाद का रिश्ता है. जोधपुर के कुछ परिवार पूर्वज का स्मरण करते हैं. बैजनाथ में उसके शिवभक्त रूप का सम्मान है.
इसलिए रावण की पूजा, उसकी मृत्यु का शोक और पुतला न जलाना एक ही बात नहीं हैं. दशहरे की इन स्थानीय कहानियों की दिलचस्पी भी इसी फर्क में है. मैदान में जलते पुतले के अलावा भी रावण की स्मृति बची हुई है, कहीं रिश्ते में, कहीं आस्था में और कहीं पूर्वज की याद में.
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