

किसी से बातचीत करने के बार-बार उसी बातचीत को याद करना, अधिकतर लोगों की आदत होती है. फिर ऐसे में अगर कोई ऐसा संकेत न मिले की सामने वाले को हमसे बात करके अच्छा लगा, तो अक्सर हम यही मान लेते हैं कि शायद हमने ही कुछ गलत कह दिया या हम बातचीत सही से नहीं कर पाए और हम अपने आप को ही जज करने लगते हैं. असल में, कई बार ये सिर्फ हमारी सोच होती है. हम अपनी छोटी-छोटी गलतियों पर ज्यादा ध्यान देते हैं और बेवजह चिंता करने लगते हैं, जबकि सामने वाला व्यक्ति बातचीत को बिल्कुल अलग नजरिए से देख रहा होता है. आज हम आपको इसी के बारे में विस्तार से बताने जा रहे हैं. इसकी जानकारी थेरेपिस्ट जेफरी मेल्टजर ने अपने इंस्टाग्राम हैंडल से वीडियो शेयर कर दी है.
क्या है ‘लाइकिंग गैप’?
थेरेपिस्ट जेफ्री मेल्टजर के अनुसार, हकीकत अक्सर वैसी नहीं होती जैसी हम सोच लेते हैं. उन्होंने बताया कि लोग हमें हमारी सोच से कहीं ज्यादा पसंद करते हैं. साइकोलॉजी में इसे ‘लाइकिंग गैप’ (Liking Gap) कहा जाता है. जेफ्री ने समझाते हुए बताया कि ‘किसी व्यक्ति से बात करने के बाद, खासकर किसी नए व्यक्ति से, लोगों को अक्सर लगता है कि सामने वाले को हम उतने पसंद नहीं आए या उसे बातचीत में उतना मजा नहीं आया.’
लाइकिंग गैप होता क्यों है?
थेरेपिस्ट के अनुसार, लाइकिंग गैप होने की एक बड़ी वजह ये है कि हम अपने मन में चल रहे हर डर, झिझक और नकारात्मक विचार को जानते हैं, लेकिन जिस व्यक्ति से हमने बात की होती है, उसे इन बातोंं का कोई अंदाजा नहीं होता. उन्होंने कहा, ‘आपको वो बात याद रहती है जो शायद ठीक से नहीं निकल पाई, या फिर वो चुप्पी जो आपको जरूरत से ज्यादा लंबी लगी. लेकिन सामने वाला व्यक्ति आपके मन में चल रहे इन विचारों को नहीं सुन सकता. वो बातचीत को वैसे ही एक्सपीरिएंस करता है, बिना ये जाने कि आप खुद को कितना गलत ठहरा रहे हैं.’
जेफ्री का कहना है कि बातचीत के बाद हम अक्सर अपनी परफॉर्मेंस को ही परखने में लगे रहते हैं. ऐसे में हम उन चीजों को नजरअंदाज कर देते हैं, जो बताते हैं कि सामने वाले को हमसे बात करके अच्छा लगा था. उन्होंने आगे समझाया, ‘जब आपको ये पता नहीं होता कि सामने वाला असल में क्या सोच रहा है, तो आपके खुद के विचार उस खाली जगह को भरने लगते हैं और उसकी तरफ से खुद ही नकारात्मक जवाब मान लेते हैं.’
लाइकिंग गैप का जीवन पर क्या होता है असर
थेरेपिस्ट जेफ्री मेल्टजर के अनुसार, जब हमें लगता है कि साामने वाला व्यक्ति हमें पसंद नहीं करता, तो हम अक्सर उस बातचीत को बार-बार अपने दिमाग में दोहराने लगते हैं और कही गई हर बात का जरूरत से ज्यादा सोचने लगते हैं. उन्होंने बताया, ‘इस तरह की ओवरथिंकिंग के कारण कई बार आप दोबारा उस व्यक्ति से बात करने या संपर्क करने से बचने लगते हैं, जबकि हो सकता है कि उसे आपके साथ समय बिताकर अच्छा लगा हो.’ इसकी वजह से एक अच्छी दोस्ती या रिश्ते की शुरुआत होने से पहले ही खत्म हो सकती है और सोशल लाइफ पर भी बुरा प्रभाव हो सकता है.
जेफ्री का कहना है कि अगली बार जब आपको किसी बातचीत के बााद ये लगे कि सामने वाला आपको पसंद नहीं करता, तो तुरंत इस निष्कर्ष पर न पहुंचें. हो सकता है कि आपका दिमाग बिना किसी ठोस सबूत के पहले ही रिजेक्शन के लिए खुद को तैयार कर रहा हो. उन्होंने सलाह दी कि ‘सामने वाले को ये दिखाने का मौका दीजिए कि वो असल में आपके बारे में क्या सोचता है. संभव है कि उसे आपकी कंपनी अच्छी लगी हो और वो भी उसी बातचीत के बाद ये उम्मीद कर रहा हो कि आप उसे पसंद करते हैं.’
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