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Explainer: कैसे भाजपा को नैरेटिव वाली ताकत देगी DUSU में ABVP की जीत, पंजाब यूनिवर्सिटी में भी लहराया था परचम | how dusu election abvp win will give energy to bjp narrative between youth and genz



नई दिल्ली:

दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ के चुनाव में ABVP को अध्यक्ष पद समेत तीन सीटों पर जीत मिली है. इसके अलावा उपाध्यक्ष पद निर्दलीय उतरे दीपांशु शौकीन विजयी रहे हैं. इस तरह कांग्रेस का छात्र संगठन NSUI खाली हाथ रहा है. नतीजों के बाद जेपी नड्डा, किरेन रिजिजू समेत भाजपा के तमाम नेताओं की प्रतिक्रिया आई है. इस जीत को उन्होंने पीएम नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में युवाओं के भरोसे की जीत करार दिया है. छात्र संघ के एक चुनाव में जीत को सीधे पीएम मोदी पर भरोसे से जोड़कर देखना बताता है कि भाजपा के लिए ABVP की यह जीत कितनी अहम है. इससे पहले संघ परिवार के छात्र संगठन को पंजाब यूनिवर्सिटी के चुनाव में भी 1 सितबर को जीत मिली थी. 

अब DUSU के चुनाव में तीन पदों पर जीत मिलना मायने रखता है. ऐसे समय में जब इसी दिल्ली में दो महीने पहले ही जंतर मंतर पर छात्रों का बड़ा आंदोलन हुआ था. शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के साथ ही वह आंदोलन खत्म हुआ था. अब उसी दिल्ली में छात्र चुनाव में जीत मिलना ABVP के लिए खुशी की बात है तो भाजपा और संघ परिवार के लिए हौसला बढ़ाने वाली सफलता है. छात्रों के आंदोलन को विपक्ष ने जेन जी की नाराजगी से जोड़ा था. छात्र संघ चुनाव में वोटर जेन जी ही होता है और वहां पर यदि संघ परिवार की विचारधारा वाला संगठन जीतता है तो उसके लिए अहम है. 

अगले कुछ महीनों में ही उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और पंजाब समेत 5 राज्यों के चुनाव आने वाले हैं. उससे पहले युवाओं के बीच भरोसा बहाली की कोशिश में भाजपा जुटी है. पीएम नरेंद्र मोदी की ओर से 51 हजार युवाओं को नियु्क्ति पत्र देना हो या फिर योगी आदित्यनाथ का एक लाख नौकरियों वाला ऐलान. हर तरफ से युवाओं को साधने की कोशिश है. इन कवायदों के बीच यदि छात्र संघ चुनाव में ABVP जीती है तो यह भाजपा के लिए टॉनिक जैसा है. हालांकि यह बात भी ध्यान देने वाली है कि छात्र संघ चुनाव का विधानसभा या फिर लोकसभा चुनाव से कोई सीधा तालमेल नहीं होता है और नतीजा कुछ भी हो सकता है, लेकिन नैरेटिव की जंग में इसका फायदा लिया जा सकता है.

कांग्रेस की संगठन वाली कमजोरी फिर उजागर हो गई

अब बात कांग्रेस की करें तो NSUI की झोली खाली रह जाना उसके लिए आत्मचिंतन की बात है. ऐसे समय में वह छात्रों की नाराजगी का फायदा नहीं उठा पाई, जब इस मसले पर भाजपा को बैकफुट पर जाना पड़ा. धर्मेंद्र प्रधान से इस्तीफा तक ले लिया गया. माना जा रहा है कि कांग्रेस का संगठन कमजोर होना और लीडरशिप का कई गुटों में बंटा होना भी इसकी एक वजह है. यही सवाल विधानसभा और लोकसभा चुनाव को लेकर भी उठता रहा है कि जमीनी माहौल का फायदा कांग्रेस चुनाव में कितना फायदा उठा सकेगी.   




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