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एनिमेशन में देखें दुनिया का पुराना मैप बदलने पर कैसे बढ़ते और सिकुड़ते हैं महाद्वीप, भारत भी बढ़ेगा | watch animation showing how continents expand and contract as the world map changes over time India too will expand



UN जनरल असेंबली ने पारंपरिक दुनिया के नक्शे को बदलकर एक ऐसा नक्शा अपनाने के लिए वोट किया है, जो अफ्रीका के आकार को ज्यादा सही ढंग से दिखाता है. टोगो की तरफ से पेश किए गए और अफ़्रीकी यूनियन (AU) के सदस्यों के समर्थन वाले “नक्शे को सही करें” (Correct the Map) प्रस्ताव को 164 देशों का समर्थन मिला, जिनमें फ़्रांस और UK भी शामिल थे. अमेरिका एकमात्र ऐसा देश था जिसने इसके खिलाफ वोट किया – और छह देशों ने वोटिंग में हिस्सा नहीं लिया

मैप का साइज बदलने की जरूरत क्यों पड़ी?

16वीं सदी से इस्तेमाल हो रहे मर्केटर मैप की आलोचना होती रही है, क्योंकि यह अफ्रीका को ग्रीनलैंड के बराबर साइज का दिखाता है, जबकि असल में अफ्रीका ग्रीनलैंड से 14 गुना बड़ा है.मैप क्लासरूम, न्यूज वेबसाइट और फोन की स्क्रीन पर चुपचाप रखे होते हैं. वे स्थिर और सटीक लगते हैं, लेकिन वे जिस दुनिया को दिखाते हैं, उसका आकार हमेशा थोड़ा-बहुत बिगड़ा हुआ होता है. क्योंकि पृथ्वी गोल है, इसलिए दुनिया के किसी भी सपाट मैप में कुछ न कुछ खींचना या सिकोड़ना पड़ता है. समय के साथ, कुछ प्रोजेक्शन आम हो गए हैं, खासकर मर्केटर प्रोजेक्शन.

एनिमेशन देखें

आलोचकों का लंबे समय से यह तर्क रहा है कि बार-बार ऐसे मैप देखने से लोगों की महाद्वीपों और देशों के साइज के बारे में सोच बदल सकती है. MDPI पर प्रकाशित एक बड़े अंतरराष्ट्रीय अध्ययन, “द इन्फ्लुएंस ऑफ़ मैप प्रोजेक्शन्स ऑन पीपल्स ग्लोबल-स्केल कॉग्निटिव मैप: ए वर्ल्डवाइड स्टडी” में इस चिंता की मापे जा सकने वाले तरीकों से जांच की गई. शोधकर्ताओं ने 1,30,000 से ज्यादा लोगों से जानकारी इकट्ठा की और उनके साइज के अनुमानों की तुलना अलग-अलग मैप प्रोजेक्शन और असल ग्लोब के अनुपात से की. इन नतीजों से कार्टोग्राफी और कॉग्निटिव साइंस में चल रही बहस को और बल मिलता है.

मर्केटर मैप विवादित क्यों है?

मर्केटर प्रोजेक्शन को 1569 में फ्लेमिश नक्शा बनाने वाले जेरार्डस मर्केटर ने बनाया था. इसे मुख्य रूप से नेविगेशन (समुद्री यात्रा) के लिए डिजाइन किया गया था, क्योंकि यह नाविकों को सीधी रेखाओं का उपयोग करके रास्ते तय करने की सुविधा देता है. हालांकि, यह प्रोजेक्शन भूमध्य रेखा (इक्वेटर) से दूर जाने पर जमीन के हिस्सों के आकार को गलत तरीके से दिखाता है. ध्रुवों (पोल्स) के पास के इलाके असलियत से कहीं ज्यादा बड़े दिखाई देते हैं, जबकि भूमध्य रेखा के आस-पास के इलाके तुलनात्मक रूप से छोटे दिखते हैं. इसका एक प्रमुख उदाहरण ग्रीनलैंड है. एक सामान्य मर्केटर मैप पर, ग्रीनलैंड का आकार अफ्रीका के आकार के करीब दिख सकता है.असलियत में, अफ्रीका का क्षेत्रफल लगभग 30.3 मिलियन वर्ग किलोमीटर है, जबकि ग्रीनलैंड का क्षेत्रफल लगभग 2.16 मिलियन वर्ग किलोमीटर है. इसलिए अफ्रीका लगभग 14 गुना बड़ा है.

आम दुनिया के नक्शों पर देखने पर अफ्रीका के आकार को भी अक्सर कम करके आंका जाता है. यह महाद्वीप इतना बड़ा है कि इसमें संयुक्त राज्य अमेरिका, चीन, भारत, जापान, मैक्सिको और यूरोप के बड़े हिस्से को एक साथ समाहित किया जा सकता है.
इस गलत आकार-प्रकार (डिस्टॉर्शन) की लंबे समय से भूगोलवेत्ताओं और अन्य लोगों द्वारा आलोचना की जाती रही है. उनका तर्क है कि दुनिया को जिस तरह से दिखाया जाता है, वह अलग-अलग क्षेत्रों के बारे में हमारी सोच को प्रभावित कर सकता है. कुछ आलोचकों ने मर्केटर प्रोजेक्शन के लगातार दबदबे को “कार्टोग्राफिक उपनिवेशवाद” (नक्शों के ज़रिए उपनिवेशवाद) का एक रूप बताया है. उनका तर्क है कि यह ‘ग्लोबल साउथ’ के देशों को देखने में छोटा दिखाता है.

इक्वल अर्थ

नए मैप का नाम ‘इक्वल अर्थ’ है. इसका मकसद दुनिया के अलग-अलग हिस्सों को उनके असली साइज के ज्यादा करीब दिखाना है.इसे पुराने मर्केटर मैप की जगह इस्तेमाल करने की मांग की गई है.

नए मैप से क्या बदलेगा?

‘इक्वल अर्थ’ प्रोजेक्शन को 2018 में मैप बनाने वालों ने तैयार किया था. यह दुनिया के महाद्वीपों को उनके असली सतह के क्षेत्रफल के ज्यादा करीब दिखाने की कोशिश करता है. इस मैप में अफ्रीका, लैटिन अमेरिका, दक्षिण एशिया और ओशिनिया पहले के मुकाबले बड़े दिखते हैं, जबकि यूरोप और उत्तरी अमेरिका छोटे दिखते हैं. दूसरे शब्दों में, यह मैप सिर्फ़ देखने में ही अलग नहीं है; इसका मकसद दुनिया के अनुपात की ज्यादा सही समझ देना है.

अमेरिका ने नाराजगी क्यों जाहिर की?

अमेरिका ने इस फैसले का कड़ा विरोध किया. अमेरिकी प्रतिनिधि यारिना फेरेन्सविच ने कहा कि ऐसे कामों से संयुक्त राष्ट्र की विश्वसनीयता कम हो रही है. उन्होंने सवाल उठाया कि जब दुनिया असली समस्याओं से जूझ रही है, तो यह संगठन 16वीं सदी के नक्शों पर बहस करके अपना समय क्यों बर्बाद कर रहा है. इसके बावजूद, संयुक्त राष्ट्र महासभा ने इस प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है. अब सदस्य देशों से पारंपरिक मर्केटर प्रोजेक्शन के बजाय ‘इक्वल अर्थ’ (Equal Earth) नक्शे का इस्तेमाल करने का आग्रह किया जा रहा है, ताकि आने वाली पीढ़ियां दुनिया के भूगोल को उसके असली रूप में समझ सकें.

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