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सुभाष चंद्रा मामले में NCLT ने अपने ही फैसले पर लगाई रोक, 99.97% हेयरकट का कई देनदार कर रहे थे विरोध   | Subhash Chandra Insolvency case: NCLT stays its previous 99 percent haircut order and will now rehear the matter



नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) ने मंगलवार को एस्सल ग्रुप के फाउंडर सुभाष चंद्रा के पर्सनल इंसॉल्‍वेंसी यानी व्यक्तिगत दिवालियापन के मामले में दिए अपने ही फैसले पर रोक लगा दी है. NCLT ने मामले की फिर से हियरिंग का फैसला किया है. यानी बेंच फिर से मामले में सुनवाई करेगी. जस्टिस (रिटायर्ड) अनूपिंदर सिंह ग्रेवाल के नेतृत्व वाली NCLT की 5 सदस्यों वाली बेंच ने कहा कि 25 अगस्त के फैसले पर कोई स्पष्ट बहुमत वाली राय नहीं बन पाई है. बेंच ने इस मामले से जुड़े सभी पक्षों को नोटिस जारी किए हैं.

अपनी प्रॉपर्टी न बेच सकेंगे, न ट्रांसफर कर सकेंगे सुभाष चंद्रा 

इसके अतिरिक्त, NCLT ने क्रेडिटर्स की ओर से पेश हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता की अपील पर सुभाष चंद्रा को अपनी प्रॉपर्टी को सीधे या अप्रत्यक्ष रूप से किसी और को ट्रांसफर करने या बेचने से भी रोक दिया है.NCLT ने कहा, ‘हम यह भी निर्देश देते हैं कि गारंटर अपनी प्रॉपर्टी को सीधे या अप्रत्यक्ष रूप से किसी और को ट्रांसफर या बेच नहीं सकता है.’ बता दें कि 5 सदस्यों वाली इस बेंच में ज्यूडिशियल मेंबर बाचू वेंकट बालारा दास और महेंद्र खंडेलवाल, और टेक्निकल मेंबर अतुल चतुर्वेदी और रवींद्र चतुर्वेदी शामिल थे.

इंडियाबुल्स हाउसिंग से जुड़ा मामला, चंद्रा बने थे गारंटर

ये मामला इंडियाबुल्स हाउसिंग फाइनेंस लिमिटेड द्वारा चंद्रा के खिलाफ शुरू की गई दिवालियापन की कार्यवाही में कई विरोधाभासी आदेशों के बाद सामने आया है. इससे पहले, NCLT की मूल दो-सदस्यीय बेंच ने पुनर्भुगतान योजना पर बंटा हुआ फैसला सुनाया था, जिसके बाद मामले को कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 419(5) के तहत तीसरे सदस्य, न्यायिक सदस्य नीलेश शर्मा के पास भेजा गया था.

25 अगस्त को, शर्मा ने दिवाला और दिवालियापन संहिता (आईबीसी) की धारा 114 के तहत पुनर्भुगतान योजना को मंजूरी दी, साथ ही अनिल कुमार द्वारा 960 लोगों की ओर से और सुनील जैन द्वारा 300 लोगों की ओर से जमा किए गए दावों को बाहर रखने का निर्देश दिया. उन्होंने यह भी निर्देश दिया कि इन दावों के लिए आवंटित राशि को शेष पात्र लेनदारों में फिर से बांटा जाए. शर्मा ने आगे कहा कि अनुमोदित योजना IBC के प्रावधानों के तहत सभी लेनदारों पर बाध्यकारी होगी, जिनमें वे लेनदार भी शामिल हैं जिन्होंने इसका विरोध किया था. 

फैसले पर नहीं बन पाई थी आम सहमति  

जब मामला मूल दो सदस्यीय पीठ के पास लौटा, तो उसने पाया कि तीसरे सदस्य के आदेश से मूल सदस्यों के बीच का मतभेद हल नहीं हुआ था और कोई बहुमत राय नहीं बन पाई थी. तकनीकी सदस्य ने पुनर्भुगतान योजना को अस्वीकार कर दिया था, जबकि न्यायिक सदस्य ने इसका लाभ केवल सहायक लेनदारों तक सीमित रखने का प्रयास किया था. इस बीच, तीसरे सदस्य ने प्लान को मंजूरी दे दी और कहा कि यह सभी लेनदारों (क्रेडिटर्स) पर लागू होगा. आम सहमति न बन पाने के कारण, मामला NCLT प्रेसिडेंट के सामने रखा गया, जिन्होंने इस मामले की नए सिरे से सुनवाई के लिए पांच सदस्यों वाली बेंच बनाई.

क्‍यों खूब चर्चा में आया ये केस? 

इस दिवालियापन मामले ने राष्ट्रीय स्तर पर काफी ध्यान खींचा, क्योंकि इसमें लगभग 22,006.57 करोड़ रुपए के स्वीकार किए गए दावों के बदले सिर्फ 6.5 करोड़ रुपए के भुगतान का प्लान था. इसका मतलब था कि लेनदारों को लगभग 99.97 प्रतिशत का नुकसान (हेयरकट) उठाना पड़ता. एलआईसी हाउसिंग फाइनेंस, यूनियन बैंक ऑफ इंडिया और केनरा बैंक समेत कई लेनदारों ने इस प्लान का विरोध किया और तर्क दिया कि प्रस्तावित रिकवरी बहुत कम थी.

LIC हाउसिंग फाइनेंस, जिसका मंजूर किया गया क्लेम 1,322.39 करोड़ रुपए था, ने तर्क दिया था कि लगभग 38.09 लाख रुपए का प्रस्तावित भुगतान उसके मंजूर किए गए बकाया का केवल 0.028 प्रतिशत था. यूनियन बैंक ऑफ इंडिया ने कहा है कि वह NCLT की मंजूरी को नेशनल कंपनी लॉ अपीलेट ट्रिब्यूनल (एनसीएलएटी) के सामने चुनौती देगा, जबकि एचडीएफसी बैंक भी अपील करने पर विचार कर रहा है.

इस मामले में सुभाष चंद्रा का पक्ष क्‍या है? 

चंद्रा ने इस कार्यवाही को भारी-भरकम व्यक्तिगत कर्ज माफी के तौर पर बताए जाने पर आपत्ति जताई है. उनका कहना है कि उन्होंने व्यक्तिगत रूप से उधारदाताओं से पैसे नहीं लिए थे और वे केवल एसेल ग्रुप से जुड़ी उधार लेने वाली कंपनियों द्वारा लिए गए कर्ज के लिए व्यक्तिगत गारंटर के तौर पर शामिल थे.

चंद्रा ने यह भी कहा है कि 22,006 करोड़ रुपए का आंकड़ा कार्यवाही में दायर क्लेम को दिखाता है और इसे उनका व्यक्तिगत बकाया कर्ज नहीं माना जाना चाहिए. उनके बयान के अनुसार, 21,696 करोड़ रुपए के क्लेम मंजूर किए गए थे, जबकि भुगतान योजना का विरोध करने वाले उधारदाताओं के कुल क्लेम लगभग 3,992 करोड़ रुपए थे.

इसमें से 620 करोड़ रुपए के क्लेम पहले ही निपटाए जा चुके थे, जिससे लगभग 3,372 करोड़ रुपए की राशि बची थी. उन्होंने आगे कहा कि उधार लेने वाली कंपनियों ने कई आपत्ति जताने वाले उधारदाताओं को लगभग 1,113 करोड़ रुपए का भुगतान करने की पेशकश की थी और बातचीत जारी है. 

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