
काठमांडू:
भयानक बाढ़ से नेपाल में अनुमान है कि करीब 200 अरब नेपाली रुपये का नुकसान हुआ है. हालांकि अब तक इस आंकड़े की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, क्योंकि तबाही के बाद रेस्क्यू और नुकसान का आंकलन हो रहा है. नेपाल के वित्त मंत्री ने हजारों करोड़ के नुकसान की आशंका जताई. वित्त मंत्री स्वर्णिम वागले ने बताया कि नेपाल को 4 से 5 अरब अमेरिकी डॉलर की जरूरत है, ताकि इससे सरकार नेपाल में पुनर्निर्माण कर सके. ये पैसे 33 हजार करोड़ से 41 हजार 500 करोड़ रुपये होता है, यानी नेपाल को संभावित इतना या इससे ज्यादा नुकसान हुआ होगा.
वित्त मंत्री वागले ने इस बारे में विस्तार से नहीं बताया कि पुनर्निर्माण का खर्च 2015 में आए भूकंप के बाद खर्च किए गए 9 अरब डॉलर से कम रहने की उम्मीद क्यों है? उस भूकंप में लगभग 9,000 लोग मारे गए थे, वहीं 5 लाख से अधिक घर नष्ट हो गए थे.
अर्थव्यवस्था को फिर पीछे धकेला
बाढ़ ने सीमावर्ती इलाके के शहरों को तबाह कर दिया, पुलों और सड़कों को अपने साथ बहा ले गई और प्रमुख जलविद्युत स्टेशनों को नुकसान पहुंचाया है. पर्यटन और जलविद्युत पर निर्भर अर्थव्यवस्था के लिए ये आपदा कई स्तरों पर विनाशकारी साबित हुई है. अब तक सामने आए आंकड़ों के मुताबिक इसने राष्ट्रीय बिजली उत्पादन क्षमता के 12 प्रतिशत से अधिक हिस्से वाले बिजली प्रोजेक्ट्स को नुकसान पहुंचाया है. इन योजनाओं में काम करने वाले 900 से ज्यादा कर्मचारी लापता बताए जा रहे हैं.

इस आपदा के आने से पहले से ही नेपाल की अर्थव्यवस्था दबाव में थी. जेन जी प्रदर्शनों के बाद सत्ता में आई प्रधानमंत्री बालेन शाहकी सरकार सीमित संसाधनों के साथ काम कर रही है. ऐसे में इस आपदा ने अर्थव्यवस्था पर कई गुना बोझ बढ़ा दिया है. इसके साथ ही पर्यटन पर निर्भर इस देश के लिए यह बाढ़ नुकसानदायक साबित हुई है क्योंकि इससे तीर्थ, ट्रेकिंग और पर्वतारोहण जैसी गतिविधियां ठप पड़ गई हैं. वर्ल्ड बैंक के मुताबिक पर्यटन नेपाल की जीडीपी का 6.4 फीसदी हिस्सा है और देश की करीब 15 फीसदी नौकरियां यहीं से आती हैं.
बाढ़ और लैंडस्लाइड से नेपाल-चीन सीमा को जोड़ने वाले पासांग ल्हामु हाईवे का 40 किलोमीटर से ज्यादा हिस्सा मलबे में दब गया है. इससे उत्तरी रसुवा जिला देश के बाकी हिस्सों से कट गया है. वहीं, ग्यिरोंग पोर्ट जाने वाला अहम इंटरेनशनल ट्रेड रूट भी बंद है.

तबाही के बाद नेपाल का भारत से भी कारोबार प्रभावित हुआ है. नेपाल-भारत बॉर्डर में बड़ी संख्या में माल वाहक ट्रक फंसे हैं. महाराजगंज में सोनोली बॉर्डर पर 16 किमी लंबी कतार लग गई. भारत-नेपाल में सालाना 75 से 92 हजार करोड़ रु का कारोबार होता है. भारत से कपड़े, इलेक्ट्रॉनिक्स, खाद्यान्न और कई सामान नेपाल जाते हैं. त्योहारों से पहले सप्लाई ठप होने से कारोबारियों को नुकसान होगा. इससे नेपाली बाजारों में सामानों की किल्लत और कीमतें बढ़ सकती हैं.
नेपाल को तकनीकी मदद की दरकार
लापता लोगों की तलाश में प्रभावित इलाके का खराब मौसम भी चुनौती बनकर उभरा है. नेपाल के शीर्ष अधिकारी नरेंद्र परियार ने रॉयटर्स को बताया कि खोज और बचाव कार्य अस्थायी रूप से रोक दिए गए हैं, क्योंकि बारिश हो रही है और मौसम धुंधला है. वहीं, नेपाल के विदेश मंत्री शिशिर खनाल ने कहा है कि देश को खोज और बचाव अभियानों में मदद की जरूरत नहीं है, बल्कि सुरंगों में फंसे लोगों को निकालने, उन स्थानों पर परिवहन और संचार लाइनों को शुरू करने जहां पुल नष्ट हो गए थे, शवों की पहचान, डीएनए परीक्षण और शवों को लंबे समय तक सुरक्षित रखने में सहायता की जरूरत है. उन्होंने रॉयटर्स को बताया, “हमने ऐसे क्षेत्रों में विशेष सेवाओं और तकनीकी सहायता के लिए अनुरोध किया है, जहां हमारे पास पर्याप्त विशेषज्ञता और तकनीकी जानकारी नहीं है.”

रसुवा और नुवाकोट के 18 से ज्यादा पहाड़ी गांवों में सड़क संपर्क टूट गया है. तिमुरे, स्याफ्रुबेसी और थुमन जैसे इलाकों तक पहुंचने के लिए फिलहाल हेलिकॉप्टर या पैदल रास्ते का सहारा लेना पड़ रहा है. सेना हेलिकॉप्टर से लोगों को निकालने और जरूरी सामान पहुंचाने में जुटी है.
बाढ़ में कई पुल बह गए या क्षतिग्रस्त हो गए हैं. इनमें रसुवागढ़ी फ्रेंडशिप ब्रिज सबसे अहम है, जो नेपाल-चीन सीमा को जोड़ता है. इसे फिर से जोड़ने की कोशिश की जा रही है. इसके अलावा भोटेकोशी और त्रिशूली नदियों पर बने छोटे सस्पेंशन ब्रिजों को भी अस्थायी तौर पर चालू करने की कोशिश हो रही है, ताकि स्थानीय लोगों की आवाजाही शुरू हो सके.
गौरतलब है कि बीते 26 अगस्त को ग्लेशियर टूटने के कारण पत्थर, बर्फ, कीचड़ और मलबे का एक विशाल सैलाब हिमालय की पहाड़ी नदी त्रिशुली से होकर गुजरा. इस विनाशकारी सैलाब में नेपाल और चीन के तिब्बत में 600 से अधिक लोगों की मौत हो गई, जबकि 2000 से अधिक लोग अभी भी लापता हैं.
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