
दुनिया में इस समय कई युद्ध चल रहे हैं. इस कठिन समय में संयुक्त राष्ट्र के अगले महासचिव का चयन हो रहा है. एंटोनियो गुटेरेश का दूसरा कार्यकाल 31 दिसंबर 2026 को खत्म होगा. नए महासचिव एक जनवरी 2027 को कामकाज संभालेंगे. यह विषय इसलिए और अधिक महत्त्वपूर्ण है कि क्या भारत इस पद के लिए अपना उम्मीदवार उतार सकता है? क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कूटनीतिक पहुंच किसी योग्य भारतीय को इस पद तक पहुंचा सकती है.
कैसे होता है संयुक्त राष्ट्र महासचिव का चुनाव
महासचिव चुनाव के साथ कुछ कठोर वास्तविकताएं भी जुड़ी हुई हैं. यह कह सकते हैं कि यह चुनाव नहीं, बल्कि महाशक्तियों की सहमति से होने वाला चयन है. संयुक्त राष्ट्र महासचिव का चुनाव राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री की तरह प्रत्यक्ष मतदान से नहीं होता. संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुच्छेद 97 के अनुसार सुरक्षा परिषद की सिफारिश पर महासभा महासचिव की नियुक्ति करती है. किसी प्रत्याशी को पहले एक या अधिक सदस्य देशों द्वारा औपचारिक रूप से नामित किया जाता है. उम्मीदवार अपना परिचय, भविष्य की कार्ययोजना, अपनी प्राथमिकताओं का विवरण और चुनाव में प्राप्त वित्तीय सहयोग का विवरण पेश करते हैं. उनके साथ सार्वजनिक संवाद आयोजित किया जाता है. इसमें वे विश्व शांति, मानवाधिकार, विकास, जलवायु परिवर्तन, संयुक्त राष्ट्र सुधार और आर्थिक संकट से संबंधित प्रश्नों के उत्तर देते हैं. इसके बाद सुरक्षा परिषद के 15 सदस्य गोपनीय अनौपचारिक मतदान करते हैं. प्रत्येक सदस्य किसी प्रत्याशी के लिए ‘प्रोत्साहित'(Encourage) ‘हतोत्साहित’ (Discourage) या ‘कोई मत नहीं’ (No Opinion) दर्ज करता है. अंततः सुरक्षा परिषद किसी एक नाम की औपचारिक सिफारिश करता है. इसके लिए कम-से-कम नौ सकारात्मक मत और अमेरिका, रूस, चीन, फ्रांस और ब्रिटेन में से किसी का भी वीटो न होना जरूरी है. इसके बाद 193 सदस्यीय महासभा उस नाम को स्वीकार करती है. व्यवहार में महासभा प्रायः सुरक्षा परिषद की सिफारिश पर सर्वसम्मति या ध्वनिमत से मुहर लगा देती है. अतः वास्तविक निर्णायक शक्ति सुरक्षा परिषद और विशेष रूप से उसके पांच स्थायी सदस्यों के पास रहती है.
कौन कौन हैं मैदान में
भारत ने अभी तक किसी नाम की घोषणा नहीं की है. अभी सात औपचारिक प्रत्याशी मैदान में हैं, जिनमें चिली की मिशेल बाचेले, इक्वाडोर की मारिया फर्नांडा एस्पिनोसा, अर्जेंटीना के राफेल मारियानो ग्रोसी, कोस्टा रिका की रेबेका ग्रिनस्पैन, गुयाना की कैरोलिन रोड्रिग्स-बिर्केट, सेनेगल के मैक्की साल और युगांडा के ओलारा ओटुन्नू. 30 जुलाई को हुए पहले अनौपचारिक मतदान (स्ट्रॉ पोल) में रेबेका ग्रिनस्पैन दस समर्थनकारी मतों के साथ सबसे आगे रहीं. कैरोलिन रोड्रिग्स-बिर्केट को नौ और राफेल ग्रोसी को सात मत प्राप्त हुए. किंतु यह केवल प्रारम्भिक संकेत है. असली तस्वीर तब सामने आएगी, जब स्थायी सदस्यों की संभावित आपत्तियां स्पष्ट होंगी. प्रथम मतदान की रिपोर्ट बताती है कि मुकाबला अभी खुला हुआ है.
महासचिव की शक्तियां क्या हैं
महासचिव संयुक्त राष्ट्र का सर्वोच्च प्रशासनिक अधिकारी होता है, लेकिन यह पद केवल कार्यालय संचालन तक सीमित नहीं है. वह संयुक्त राष्ट्र सचिवालय का नेतृत्व करता है, वरिष्ठ अधिकारियों और विशेष दूतों की नियुक्ति करता है, महासभा और सुरक्षा परिषद के समक्ष रिपोर्ट प्रस्तुत करता है और शांति, विकास और मानवाधिकार से जुड़े कार्यक्रमों को दिशा देता है. संयुक्त राष्ट्र चार्टर का अनुच्छेद 99 महासचिव को एक असाधारण अधिकार देता है. यदि उसकी नजर में कोई परिस्थिति अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा के लिए खतरा बन सकती है, तो वह स्वयं उस विषय को सुरक्षा परिषद के समक्ष ला सकता है. वह प्रत्यक्ष वार्ता, गोपनीय संदेश, विशेष दूत, फैक्ट-फाइंडिंग मिशन, निवारक कूटनीति और शटल डिप्लोमेसी के माध्यम से उन पक्षों को बातचीत की मेज पर ला सकता है, जो सार्वजनिक रूप से एक-दूसरे से संवाद करने को तैयार नहीं होते हैं.
इसके बाद भी महासचिव सर्वशक्तिमान नहीं है. उसके पास अपनी सेना, वीटो या स्वतंत्र आर्थिक प्रतिबंध लगाने की शक्ति नहीं होती. वह किसी देश को युद्धविराम के लिए बाध्य नहीं कर सकता. संयुक्त राष्ट्र की शांति सेना, बजट और प्रवर्तन संबंधी कार्रवाई सदस्य देशों की सहमति पर निर्भर रहती है. इसलिए महासचिव की शक्ति आदेश देने में नहीं, बल्कि असंभव प्रतीत होने वाले संवाद को संभव बनाने में निहित है.
‘तीसरी दुनिया’ से ‘ग्लोबल साउथ’ तक
शीतयुद्ध के दौरान वे देश जो किसी भी गुट में शामिल नहीं थे, उन्हें ‘तीसरी दुनिया’ का देश कहा गया. भारत गुटनिरपेक्ष आंदोलन का संस्थापक रहा है. इसने उपनिवेशवाद, रंगभेद और विदेशी प्रभुत्व के खिलाफ संघर्षरत देशों का समर्थन किया. भारतीय सैनिकों और पुलिसकर्मियों ने करीब 50 संयुक्त राष्ट्र शांति अभियानों में सेवाएं दी हैं. भारत संयुक्त राष्ट्र शांति अभियानों में सबसे बड़े योगदानकर्ताओं में रहा है. अब तीसरी दुनिया की जगह ‘ग्लोबल साउथ’ टर्म का इस्तेमाल किया जाता है. आज भारत को केवल विकासशील देश नहीं, बल्कि ग्लोबल साउथ की प्रभावशाली आवाज के रूप में देखा जा रहा है. हाल के सालों में भारत ने ‘वॉयस ऑफ ग्लोबल साउथ’ सम्मेलनों के माध्यम से विकासशील देशों की चिंताओं को विश्व मंच तक पहुंचाया. भारत की जी-20 अध्यक्षता में अफ्रीकी संघ को स्थायी सदस्य बनाया जाना, उसकी सबसे उल्लेखनीय कूटनीतिक उपलब्धियों में से एक है. सरकार के आधिकारिक विवरण में भी इसे भारत की पहल से ग्लोबल साउथ के प्रतिनिधित्व का ऐतिहासिक विस्तार माना गया है.

संयुक्त राष्ट्र महासचिव पद की दौड़ को जीतने के लिए भारत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अंतरराष्ट्रीय छवि का फायदा उठा सकता है.
भारत की सबसे बड़ी शक्ति इसकी रणनीतिक स्वायत्तता है. यह अमेरिका का निकट साझेदार है, लेकिन रूस से अपनी पुरानी मित्रता भी बनाए हुए है. इसके इजराइल के साथ मजबूत संबंध हैं, पर यह स्वतंत्र फिलस्तीन का समर्थन भी करता है. सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और अन्य खाड़ी देशों के साथ इसके गहरे आर्थिक संबंध हैं, जबकि ईरान के साथ संवाद भी कायम है. दरअसल यही बहुपक्षीय संतुलन भारत को संभावित मध्यस्थ बनाता है.
पीएम नरेंद्र मोदी की अंतरराष्ट्रीय छवि का फायदा उठा पाएगा भारत?
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने व्यक्तिगत कूटनीति को भारतीय विदेश नीति का महत्त्वपूर्ण साधन बनाया है. अमेरिका, रूस, फ्रांस, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, फिलस्तीन, मिस्र, ब्राजील तथा अफ्रीकी और कैरेबियाई देशों के साथ उनकी सक्रियता ने भारत की वैश्विक पहुंच को व्यापक बनाया है. उन्हें दुनिया के कई देशों ने अपने सर्वोच्च नागरिक सम्मान से सम्मानित किया है. यह भारत के बढ़ते कूटनीतिक महत्त्व का प्रतीक भी है. लेकिन अंतरराष्ट्रीय सम्मान अपने आप सुरक्षा परिषद के मतों में नहीं बदल जाते हैं. किसी देश के नेता के साथ मित्रता एक राजनीतिक पूंजी अवश्य है, किंतु महासचिव पद के लिए अमेरिका, रूस और चीन इन तीनों का एक साथ विश्वास प्राप्त करना अधिक कठिन चुनौती है. मोदी भारतीय उम्मीदवारी को विश्व के सामने प्रभावशाली ढंग से पेश कर सकते हैं, परंतु अंतिम सफलता इस पर निर्भर करेगी कि उम्मीदवार को केवल भारत का प्रतिनिधि माना जाता है या पूरी मानवता का निष्पक्ष संरक्षक.
भारतीय उम्मीदवार को नामित करने और उसके लिए वैश्विक समर्थन जुटाने में प्रधानमंत्री मोदी की भूमिका निर्णायक होगी. किंतु नामांकन के बाद उम्मीदवार को किसी दल, सरकार या राष्ट्राध्यक्ष का प्रतिनिधि नहीं रहना चाहिए. संयुक्त राष्ट्र चार्टर का अनुच्छेद 100 महासचिव और संयुक्त राष्ट्र कर्मचारियों को किसी भी सरकार से निर्देश लेने से रोकता है. इसलिए लक्ष्य संयुक्त राष्ट्र में ‘मोदी का आदमी’ नियुक्त करना नहीं, बल्कि मोदी के कूटनीतिक प्रभाव से ऐसे भारतीय को आगे बढ़ाना होना चाहिए, जिस पर पूरी दुनिया विश्वास कर सके. भारत को तत्काल पांचों स्थायी सदस्यों, ग्लोबल साउथ के प्रमुख देशों, अफ्रीकी संघ, अरब देशों, यूरोपीय संघ और लैटिन अमेरिकी समूहों के साथ गोपनीय विचार-विमर्श करना चाहिए. यदि वास्तविक समर्थन दिखाई दे, तो शीघ्र किसी योग्य उम्मीदवार का नाम आगे बढ़ाना चाहिए.
भारत दुनिया को क्या दे सकता है?
कोई भी महासचिव अकेले विश्व शांति स्थापित नहीं कर सकता. किंतु वह युद्धरत देशों के बीच संवाद की वह अंतिम डोर बन सकता है, जिसके टूट जाने पर केवल विनाश शेष रह जाता है. भारत दुनिया को ऐसा राजनयिक दे सकता है, जो अमेरिका से बात करे तो रूस उसे संदेह से न देखे, जो ईरान से संवाद करे तो खाड़ी देशों का विश्वास न खोए, जो इजराइल को सुरक्षा का भरोसा दे और फिलस्तीन के न्यायपूर्ण अधिकारों की भी रक्षा करे और जो ग्लोबल साउथ की आवाज बने, लेकिन पश्चिम को शत्रु न माने. भारतीयता अवसर का द्वार खोल सकती है, लेकिन निष्पक्षता, साहस और विवेक ही किसी भारतीय को विश्व का वास्तविक शांति-दूत बना सकते हैं.
(डिस्क्लेमर: सुभाष कुमार ठाकुर बिहार के बाबासाहेब भीमराव अम्बेदकर बिहार विश्वविद्यालय, मुजफ्फरपुर के राजनीति विज्ञान विभाग में रिसर्च स्कॉलर हैं. लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखकों के निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)





