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राजस्थान कांग्रेस में छिड़ी नई जंग! डोटासरा के तेवरों से बढ़ी चर्चा; अशोक गहलोत खेमे में हलचल | Rajasthan Congress Crisis Govind Singh Dotasara vs Ashok Gehlot New Battle erupts within party



राजस्थान की राजनीति में अब एक नई सियासी कलह जन्म लेती नजर आ रही है. ये कलह है कांग्रेस की अंदरूनी लड़ाई की. लेकिन इस बार ये लड़ाई सचिन पायलट और अशोक गहलोत के बीच वर्चस्व की नहीं, बल्कि गोविंद सिंह डोटासरा बनाम अशोक गहलोत दिख रही है. गोविंद सिंह डोटासरा जिन्हें अशोक गहलोत का करीबी माना जाता है, उनके बयानों से दोनों नेताओं के बीच बढ़ती दूरी सामने नजर आ रही है. राजनीतिक विशेषज्ञ लंबे समय से ये बात कहते हैं कि डोटासरा अब गहलोत की छत्रछाया से बाहर निकलकर आगे बढ़ना चाहते हैं और आज के बयानों ने इस बात पर मोहर भी लगा दी है. 

अशोक गहलोत के समर्थन में लगे नारे

दरअसल, आज यानी गुरुवार सुबह करीब 309 बीएपी कार्यकर्ता पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के सिविल लाइंस घर पर पहुंचे. ये सभी कार्यकर्ता पूर्व मंत्री महेंद्रजीत सिंह मालवीया के साथ पहुंचे थे. आदिवासी परंपरा के परिवेश और संगीत के बीच सभी कार्यकर्ता कांग्रेस में शामिल होने की घोषणा करने पहुंचे. अशोक गहलोत ने इस दौरान सभी से मुलाकात की, तो पूरे हॉल में चौथी बार गहलोत सरकार, हमारा मुख्यमंत्री कैसा हो अशोक गहलोत जैसा हो के नारे लगे. इसी बीच गहलोत कार्यकर्ताओं को पार्टी आलाकमान के नारे लगाने का ईशारा करते भी दिखे. 

इसके बाद सभी कार्यकर्ता पीसीसी जयपुर पहुंचे तो वहां भी ऐसे ही नारे लगे. महेंद्रजीत सिंह मालवीया भाषण दे रहे थे. इसी बीच डोटासरा ने माइक उनके हाथ से लेकर बोला कि मुख्यमंत्री वाला नारा कोई नहीं लगाएगा. किसी के व्यक्तिगत नाम का नारा मत लगाओ.

महेंद्रजीत सिंह को डोटासरा की नसीहत

वहीं, इसके बाद जब डोटासरा से ये सवाल पूछा गया कि मालवीया जी पहले गहलोत के यहां गए तो वे बोले कि कोई किसी के पास जाए मुझे फर्क नहीं पड़ता. मैं तो कांग्रेस के कार्यकर्ता का स्वागत करता हूं. ये तो मालवीय को सोचना चाहिए कि इनको क्या करना है, क्या नहीं करना. कोई व्यक्ति अपनी ब्रांडिंग के लिए काम करता है वो उनको मुबारक हो. मैं किसी की ब्रांडिंग के लिए काम नहीं करता, मैं तो सिर्फ कांग्रेस के लिए काम करता हूं. 

वहीं उन्होंने लगे हाथ मालवीया को नसीहत भी दे डाली. वे बोले कि मालवीय जी BJP में गए थे, इनकी दाल नहीं गली. ना तो ये विधायक बन सके और न ही सांसद बन पाए. कोई गलतफहमी हो तो एक बार फिर मालवीय पार्टी बदले लें. अगर ये जीतकर आ जाए तो मेरा नाम बदला देना. मैंने इनको हराने का चैलेंज दिया था और हराया. मेरी अभिशंसा के बिना ये अब भी कांग्रेस में नहीं आ सकते थे.

ये बयानबाजी राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय है. चाय की थड़ी की चौपाल से लेकर सोशल मीडिया के पटल पर इस बात की चर्चा है कि क्या कांग्रेस में एक नई वर्चस्व की लड़ाई जन्म ले रही है. गहलोत के करीबी डोटासरा क्या अब उनसे आगे बढ़ने की कोशिश कर रहे हैं. क्या अब पायलट गहलोत की लड़ाई में उलझी कांग्रेस अपने अंदर ही त्रिकोणीय संघर्ष में पिस रही है.

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